शुक्रवार, 15 मई 2026

Come Follow to You Vol 1 10

 नीचे दिए गए सात प्रश्नों और ओशो के उत्तरों का हिंदी अनुवाद प्रस्तुत है। यह प्रश्नोत्तर सत्र 'कम फॉलो टू यू वॉल्यूम 1' के अंतिम भाग का है।


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प्रश्न 1:

क्या आप कभी रोते हैं?


उत्तर:


हाँ, जब भी मैं तुम्हें देखता हूँ। तुम मेरे आँसू नहीं देख सकते, तुम मेरी पुकार नहीं सुन सकते, लेकिन जब मैं तुम्हें देखता हूँ, तो वह पुकार हमेशा वहाँ होती है। इसी कारण, मैं तुम पर काम करता रहता हूँ। यह केवल तुम्हें तुम्हारी दुर्दशा से बाहर निकालने में मदद करने के लिए नहीं है; यह अपनी मदद करने के लिए भी है। यदि तुम अपनी दुर्दशा से बाहर आ जाते हो, तो मैं अपनी उस दुर्दशा से बाहर आ जाऊँगा जो तुम्हारी दुर्दशा द्वारा पैदा की गई है।

Come Follow to You Vol 1 09

 नीचे लूका 9:57-62 के सुसमाचार अंश और ओशो के उस पर दिए गए प्रवचन का हिंदी अनुवाद प्रस्तुत है।


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लूका 9

57 और ऐसा हुआ कि जब वे मार्ग में जा रहे थे, तो एक व्यक्ति ने उससे कहा, "प्रभु, मैं जहाँ कहीं तू जाए, तेरे पीछे चलूँगा।"

58 यीशु ने उससे कहा, "लोमड़ियों के बिल होते हैं, और आकाश के पक्षियों के घोंसले होते हैं; परन्तु मनुष्य के पुत्र के पास सिर रखने को भी जगह नहीं है।"

59 उसने दूसरे से कहा, "मेरे पीछे चल आ।" परन्तु उसने कहा, "प्रभु, पहले मुझे जाकर अपने पिता को दफनाने दे।"

60 यीशु ने उससे कहा, "मुर्दों को अपने मुर्दे दफनाने दे; तू जा और परमेश्वर के राज्य का प्रचार कर।"

61 एक और ने भी कहा, "प्रभु, मैं तेरे पीछे चलूँगा; परन्तु पहले मुझे अपने घर के लोगों से विदा लेने दे।"

62 यीशु ने उससे कहा, "जो कोई हल पर हाथ रखकर पीछे देखता है, वह परमेश्वर के राज्य के योग्य नहीं है।"

Come Follow to You Vol 1 08

 नीचे दिए गए अंग्रेजी प्रवचन (Come Follow to You Vol 1, प्रकरण 08) का हिंदी अनुवाद प्रस्तुत है। यह एक प्रश्नोत्तर सत्र है।


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प्रश्न 1:

जिस व्यक्ति को जीवन भर विश्लेषण (analyze), प्रश्न (question) और संदेह (doubt) करने के लिए प्रशिक्षित (trained) किया गया है, वह संदेह और विश्वास (trust) के बीच की खाई को कैसे पाट सकता है?


उत्तर:


संदेह (doubt) अपने आप में सुंदर है। समस्या तब पैदा होती है जब तुम उसमें फंस (stuck) जाते हो। तब संदेह मृत्यु बन जाता है। विश्लेषण तब सही होता है जब तुम उससे अलग (seperate) और दूर (aloof) रहते हो। यदि तुम उससे तादात्म्य (identified) बन जाते हो, तो समस्या पैदा होती है। तब विश्लेषण एक पक्षाघात (paralysis) बन जाता है। यदि तुम महसूस करते हो कि तुम विश्लेषण, प्रश्न और संदेह करने के लिए प्रशिक्षित हो गए हो, तो दुखी मत हो। संदेह करो, विश्लेषण करो, प्रश्न करो, लेकिन अलग (seperate) रहो।

Come Follow to You Vol 1 07

नीचे दिए गए अंग्रेजी प्रवचन (मत्ती 9:9-13 और लूका 9:23-25 पर ओशो का प्रवचन) का हिंदी अनुवाद प्रस्तुत है।


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मत्ती 9

9 और जब यीशु वहाँ से आगे बढ़ा, तो उसने मत्ती नामक एक व्यक्ति को चुंगी की चौकी पर बैठे देखा, और उससे कहा, "मेरे पीछे चल।" वह उठा, और उसके पीछे हो लिया।

10 और ऐसा हुआ कि जब यीशु उसके घर में भोजन करने बैठा, तो कई महसूल लेने वाले और पापी आए और उसके और उसके चेलों के साथ भोजन करने लगे।

11 यह देखकर फरीसियों ने उसके चेलों से कहा, "तुम्हारा गुरु महसूल लेने वालों और पापियों के साथ क्यों खाता-पीता है?"

12 यह सुनकर यीशु ने उनसे कहा, "भले-चंगों को वैद्य की आवश्यकता नहीं, परन्तु बीमारों को।"

13 पर जाकर सीखो कि इसका क्या अर्थ है, 'मैं दया चाहता हूँ, न कि बलिदान'; क्योंकि मैं धर्मियों को नहीं, परन्तु पापियों को बुलाने आया हूँ।"

Come Follow to You Vol 1 06

 नीचे दिए गए छह प्रश्नों और ओशो के उत्तरों का हिंदी अनुवाद प्रस्तुत है। यह प्रवचन 'कम फॉलो टू यू वॉल्यूम 1' के अंश पर आधारित एक प्रश्नोत्तर सत्र है।


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प्रश्न 1:

गुरु-शिष्य संबंधों में और सामान्य मानवीय संबंधों में गोपनीयता (secrecy) की क्या आवश्यकता है?


उत्तर:


अस्तित्व के दो पहलू हैं, बाहर और भीतर। बाहर को सार्वजनिक किया जा सकता है, लेकिन भीतर को नहीं। यदि तुम भीतर को सार्वजनिक कर दोगे, तो तुम अपनी आत्मा खो दोगे, अपना मूल चेहरा खो दोगे। फिर तुम ऐसे जिओगे मानो तुम्हारा कोई आंतरिक अस्तित्व ही नहीं है। जीवन नीरस, व्यर्थ हो जाएगा। यह उन लोगों के साथ होता है जो सार्वजनिक जीवन जीते हैं: राजनेता, फिल्म अभिनेता। वे सार्वजनिक हो जाते हैं, वे अपना आंतरिक अस्तित्व पूरी तरह खो देते हैं, वे नहीं जानते कि वे कौन हैं, सिवाय उसके जो जनता उनके बारे में कहती है। वे दूसरों की राय पर निर्भर होते हैं, उन्हें अपने अस्तित्व का कोई एहसास नहीं होता।

Come Follow to You Vol 1 05

 नीचे दिए गए अंग्रेजी प्रवचन (Come Follow to You Vol 1, प्रकरण 05) का हिंदी अनुवाद प्रस्तुत है। यह ओशो द्वारा मत्ती के सुसमाचार के अंशों पर दिया गया एक आध्यात्मिक प्रवचन है।


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मत्ती 4

17 उस समय से यीशु प्रचार करने लगा और कहने लगा, "मन फिराओ, क्योंकि स्वर्ग का राज्य निकट आ गया है।"

18 और यीशु गलील की झील के किनारे-किनारे चलते हुए दो भाइयों, यानी पतरस कहलाने वाले शमौन और उसके भाई अन्द्रियास को, झील में जाल डालते देखा; क्योंकि वे मछुए थे। 

19 उसने उनसे कहा, "मेरे पीछे आओ, मैं तुम्हें मनुष्यों के मछुए बनाऊँगा।" 

20 वे तुरन्त अपने जाल छोड़कर उसके पीछे हो लिए।

Come Follow to You Vol 1 04

 नीचे दिए गए छह प्रश्नों और ओशो के उत्तरों का हिंदी अनुवाद प्रस्तुत है। यह ओशो के प्रवचन 'कम फॉलो टू यू वॉल्यूम 1' के अंश पर आधारित प्रश्नोत्तर सत्र है।


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प्रश्न 1:

आपके डायनामिक मेडिटेशन के एक ही सत्र ने मेरे भीतर इतना आनंद और अस्तित्व का एहसास भर दिया है, जितना बीस वर्षों तक नए नियम की कहानियाँ सुनने और एक सर्वशक्तिमान तथा दूरस्थ ईश्वर से प्रार्थना करने में नहीं मिला, जो मेरे लिए एक अअनुभवनीय गोदो (Godot) बना रहा। क्या यह संभव है कि यीशु की शिक्षाएँ सभी साधकों के लिए सहायक न हों – हाँ, यहाँ तक कि उनके लिए, या कुछ के लिए, विषैली भी हो सकती हैं?


उत्तर:


ईसाई धर्म और मसीह (Christ) को कभी भ्रमित नहीं करना चाहिए। मसीह ईसाई धर्म से बिल्कुल अलग है, इसलिए जब भी तुम मसीह को समझना चाहो, सीधे और तुरंत जाओ – रोम के रास्ते नहीं; तब तुम कभी मसीह को नहीं समझ पाओगे। मसीह, कृष्ण या बुद्ध को संगठित नहीं किया जा सकता: वे इतने विशाल हैं कि कोई भी संगठन उनके साथ न्याय नहीं कर सकता। केवल छोटी चीजों को संगठित किया जा सकता है।

Come Follow to You Vol 1 03

 नीचे दिए गए अंग्रेजी प्रवचन का हिंदी अनुवाद प्रस्तुत है। यह ओशो द्वारा दिया गया एक आध्यात्मिक प्रवचन है, जिसमें जॉन द बैप्टिस्ट और यीशु के प्रसंगों की व्याख्या की गई है।


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हिंदी अनुवाद:


मैंने एक कहानी सुनी है – यह उन दिनों की है जब शूरवीर और महल हुआ करते थे। एक युवा अंग्रेज़ अपनी किस्मत तलाश रहा था, पूरी भूमि पर भटक रहा था। थक कर, वह एक महल के पास एक पेड़ के नीचे आराम करने के लिए रुका। महल का ड्यूक वहाँ से गुज़र रहा था। वह रुका और पूछा कि युवक वहाँ क्यों इंतज़ार कर रहा है, वह किसकी तलाश में है। युवक ने कहा, "मैं एक वास्तुकार हूँ और मैं काम की तलाश में हूँ।"

Come Follow to You Vol 1 02

 नीचे दिए गए छह प्रश्नों और ओशो के उत्तरों का हिंदी अनुवाद प्रस्तुत है। यह प्रश्नोत्तर सत्र मत्ती 9 और लूका 9 पर दिए गए प्रवचन के बाद आते हैं।


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प्रश्न 1:

आपके लिए रास्ता किसने तैयार किया?


उत्तर:


किसी ने भी मेरे लिए रास्ता नहीं तैयार किया है, और न ही मैं किसी के लिए रास्ता तैयार कर रहा हूँ। यह समझना होगा।


चार संभावनाएँ हैं। पहली, सबसे पुरानी और सबसे अधिक उपयोग की गई, वह है जो यीशु के मामले में हुई। जॉन द बैप्टिस्ट ने रास्ता तैयार किया; शिष्य गुरु से पहले आया। इसके अपने लाभ हैं, लेकिन इसकी अपनी सीमाएँ और दोष भी हैं – ऐसा होना ही है। 

जब शिष्य गुरु से पहले आता है, तो वह अपनी सीमाएँ पैदा करेगा और गुरु को उन्हीं सीमाओं के भीतर कार्य करना होगा। इसके लाभ हैं क्योंकि जब गुरु आता है, तो उसे जमीन तैयार करने की चिंता नहीं करनी पड़ेगी – जमीन तैयार होगी; वह तुरंत बीज बोना शुरू कर सकता है – लेकिन जमीन शिष्य के अनुसार तैयार होगी। यह गुरु के अनुसार नहीं हो सकती, इसलिए उसे सीमाओं के भीतर कार्य करना होगा। इसी ने यीशु की कहानी में पूरी परेशानी पैदा की।

Come Follow to You Vol 1 01

 नीचे यूहन्ना (John) 1 के अंश और ओशो के उस पर दिए गए प्रवचन का हिंदी अनुवाद प्रस्तुत है। मैंने भाषा को सरल, प्रवाहपूर्ण और मूल के अनुरूप रखने की कोशिश की है।


यूहन्ना 1 (John 1)


1 आदि में वचन था, और वचन परमेश्वर के साथ था, और वचन परमेश्वर था।

3 सब कुछ उसी के द्वारा बनाया गया, और जो कुछ बना, उसमें से कोई भी उसके बिना नहीं बना।

4 उसमें जीवन था, और वह जीवन मनुष्यों की ज्योति थी।

5 और वह ज्योति अंधकार में चमकती है, और अंधकार उसे समझ नहीं पाया।

6 परमेश्वर की ओर से एक मनुष्य भेजा गया, जिसका नाम यूहन्ना था।

7 वह गवाही देने आया, उस ज्योति की गवाही देने, ताकि सब लोग उसके द्वारा विश्वास करें।

मंगलवार, 5 मई 2026

The Psychology of the Esoteric 6 विश्लेषण मेरी दृष्टि मे,pdf photo , सातों शरीर, सातों सपने: ओशो की गहन आध्यात्मिक व्याख्या

 

The Psychology of the Esoteric 6 विश्लेषण मेरी दृष्टि मे, सातों शरीर, सातों सपने: ओशो की गहन आध्यात्मिक व्याख्या

प्रश्न 1: क्या आप समझा सकते हैं कि सपनों (ड्रीम्स) से आपका क्या अभिप्राय है?


 सातों शरीर और उनके सपने: ओशो की गहन व्याख्या

"सपना सबसे महान गूढ़ क्षेत्रों में से एक है। मैंने इसके बारे में कुछ कहा है ताकि आप सचेत होना शुरू कर सकें।" — ओशो

परिचय: सपनों का बहुआयामी संसार

हमारे जीवन का एक तिहाई हिस्सा नींद में बीतता है। इन नींद की घड़ियों में हम सपने देखते हैं। लेकिन क्या हमने कभी सच में पूछा है—सपना क्या है?

पश्चिमी विज्ञान कहता है: सपने केवल मस्तिष्क की यांत्रिक प्रक्रिया हैं।

पश्चिमी मनोविज्ञान कहता है: सपने दबी हुई इच्छाओं का प्रतिबिम्ब हैं।

लेकिन ओशो एक पूरी तरह अलग और गहरी सच्चाई बताते हैं। उनके अनुसार, हमारे सात शरीर हैं, और प्रत्येक के अपने-अपने सपने हैं। जब तक आप इन सातों को नहीं समझते, तब तक आप अपने स्वयं के अस्तित्व से ही परिचित नहीं हैं।

सोमवार, 4 मई 2026

The Psychology of the Esoteric 5 Osho विश्लेषण मेरी दृष्टि मे pdf photo

 

The Psychology of the Esoteric 5 Osho विश्लेषण मेरी दृष्टि मे

 प्रश्न 1: क्या शरीर और मन, पदार्थ और चेतना, भौतिक और आध्यात्मिक के बीच कोई विभाजन है? आध्यात्मिक चेतना प्राप्त करने के लिए कोई शरीर और मन को कैसे परातीत (ट्रान्सेंड) कर सकता है?


1. क्या वास्तव में शरीर–मन–चेतना में कोई विभाजन है?

सीधे शब्दों में:

अस्तित्व के स्तर पर – नहीं।

अनुभव और व्यवहार के स्तर पर – हाँ, दिखाई देता है।

🔹 अस्तित्व (Reality) में  तुम जो हो, वह एक अखंड प्रवाह है — शरीर + मन + चेतना अलग-अलग चीजें नहीं, 

      बल्कि एक ही ऊर्जा के विभिन्न स्तर हैं।

जैसे समुद्र और लहर अलग नहीं हैं, वैसे ही शरीर और चेतना अलग नहीं हैं।

🔹 अनुभव (Experience) में तुम्हें लगता है कि “मैं” शरीर से अलग हूँ

      या “मन” शरीर से अलग है

→ यह मन की प्रक्रिया (thinking process) का परिणाम है

👉 यही बात तुमने सही पकड़ी:

विभाजन “वास्तविक” नहीं, बल्कि “मानसिक संरचना (mental construct)” है।

शनिवार, 2 मई 2026

The Psychology of the Esoteric 3 विश्लेषण मेरी दृष्टि मे ,pdf photo काम से राम तक: ओशो की ऊर्जा रूपांतरण साधना - साक्षी भाव से अद्वैत तक





 

The Psychology of the Esoteric 3 विश्लेषण मेरी दृष्टि मे , काम से राम तक: ओशो की ऊर्जा रूपांतरण साधना - साक्षी भाव से अद्वैत तक


परिचय

यह प्रस्तुति ओशो के गहन दर्शन का एक सारांश है जो जीवन ऊर्जा के रूपांतरण की प्रक्रिया को समझाता है।

 ओशो का मूल संदेश यह है कि सेक्स को दबाना नहीं है, बल्कि जागरण के माध्यम से इसे उच्चतर आयामों में बदलना है।

1. ऊर्जा की एकता और तटस्थता

मौलिक सिद्धांत:

ऊर्जा एक ही है। जैसे बिजली एक ही है, लेकिन पंखे में हवा देती है और हीटर में गर्मी; 

वैसे ही जीवन ऊर्जा एक है, केवल उसके अनुप्रयोग अलग-अलग हैं।

जब यह ऊर्जा शरीर के माध्यम से बहती है, तो 'सेक्स' कहलाती है। 

जब हृदय के माध्यम से बहती है, तो 'प्रेम' बनती है। 

जब बुद्धि से बहती है, तो 'विचार' या 'विज्ञान' बनती है।

निष्कर्ष: 

ऊर्जा अपने आप में न तो पवित्र है और न ही अपवित्र। यह तटस्थ है।

 उसकी पवित्रता या अपवित्रता उस 'द्वार' पर निर्भर करती है जिससे वह बाहर आती है।

2. उर्ध्वगमन ब नाम रूपांतरण

ओशो 'सब्लिमेशन' (उर्ध्वगमन) शब्द को अस्वीकार करते हैं क्योंकि इसमें संघर्ष और दमन की गंध आती है।

पत्थर और हीरेका दृष्टांत:

यदि आप हाथ में पत्थर पकड़े हैंऔर अचानक आपको हीरा मिल जाए, तो क्या होगा? आप पत्थर को 'त्यागने' के लिए संघर्ष नहीं करेंगे- वह अपने आप गिर जाएगा!

इसी तरह, जब ध्यान के माध्यम से उच्चतर आनंद उपलब्ध होता है, तो सेक्स की ऊर्जा स्वतः ही नए मार्ग पर मुड़ जाती है। यह कोई ज़बरदस्ती किया गया बदलाव नहीं है, बल्कि एक प्राकृतिक विकास है।

3. ध्यान: रूपांतरण की विधि

सेक्स को आध्यात्मिक बनाने का एकमात्र तरीका है सजगता (Awareness)।

साक्षी भाव (Witnessing):

आमतौर पर सेक्स एक अचेतन, यांत्रिक और स्वचालित क्रिया है। ओशो सुझाते हैं कि जब आप सेक्स करें, तो पूरी तरह उसमें मौजूद रहें। हर स्पर्शको महसूससू करें, हर सांस को जागरूकता केसाथ लें।

जंपिंग बोर्ड(Jumping Board):

सेक्स प्रकृति के साथ हमारा सबसे गहरा संवाद है। इस सघन क्षण में यदि आप 'साक्षी' बन जाएँ, तो एक महत्वपूर्ण अनुभव होता है -

आप अचानक जान जाते हैं कि आप शरीर से पृथक कुछ और हो। यह अनुभव चेतना के उच्च स्तरों की ओर छलांग लगाने का आधार बनता है।

4. प्रेम और करुणा का उदय

ओशो 'सेक्स' और 'प्रेम' के बीच के प्रचलित भ्रम को तोड़तेहैं। हम जिसे प्रेम कहतेहैं, वह अक्सर सेक्स के लिए महज़ एक 'भूमिका'(Foreplay) होता है।

सच्चा प्रेम की परिभाषा:

सच्चा प्रेम सेक्स के बाद पैदा होता है। जब दो व्यक्ति ध्यानपूर्णहोकर सेक्स सेगुजरते हैं, तो उनके बीच कुछ गहरा बदलाव होता है -

एक-दूसरे के लिए कृतज्ञता (Gratitude), हृदय मेंकरुणा (Compassion), एक-दूसरे के प्रति सम्मान (Reverence)।

यह है प्रेम की सुगंध - न कि शारीरिक आकर्षण, बल्कि आत्मा का आत्मा से मिलना।

5. यात्रा के चार चरण: काम से राम तक

यह यात्रा एक सीढ़ी की तरह है, जहाँ हर चरण पिछले चरण का विकास है:

चरण.                             आयाम.                        माध्यम.                             अनुभव

काम (Sex)                    शारीरिक.                     शरीर का मिलन.                क्षणिक जैविक सुख

प्रेम (Love)                   मानसिक-आत्मिक.        हृदय का मिलन.                करुणा, कृतज्ञता

प्रार्थना (Prayer)          आध्यात्मिक.                 चेतना का विस्तार.              द्वैत विलय

अद्वैत (Oneness)         दिव्य.                          कोई मिलन नहीं.                 परम आनंद

6. दमन का खतरा

ओशो चेतावनी देतेहैं: "धर्मों.  ने र्सेक्स को 'पाप' बताकर मनुष्य को विक्षिप्त बना दिया है।"

1. विकृति (Perversion): दबाई गई ऊर्जा सड़ने लगती है और विकृत कामुकता के रूप में प्रकट होती है।

2. मानसिक बीमारी: दमन से अवसाद, चिंता, और आत्महीनता आती है।

3. आत्म-विरोध: आप अपने ही विरुद्ध लड़ने लगते हैं।

4. ध्यान में बाधा: एक दमित मन कभी ध्यान की गहराइयों मेंनहीं उतर सकता।

स्वस्थता आवश्यक है: दिव्य की ओर जानेके लिए पहले 'सामान्य' और 'स्वस्थ' होना अनिवार्य है।

7. निष्कर्ष: पारदर्शी बनाना

"हर पत्थर के नीचे प्रभु है"

ओशो की अंतिम सीख यह है: किसी भी चीज़ से लड़ें मत।

सेक्स एक पत्थर की तरह है। यदि आप इससे लड़ेंगे, तो वह अपारदर्शी रहेगा।

 लेकिन यदि आप इस पर ध्यान करेंगे, उसमें जागेंगे, तो वह कांच की तरह पारदर्शी हो जाएगा।

और जब कांच पारदर्शी हो जाता है, तो आप इसके पार 'दैवीय' को देख पाते हैं। जब दृश्य पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है, तो कांच स्वतः ही विस्मृत हो जाता है।

यह लेख हमें सिखाता है कि:

• दमन नहीं, बल्कि दर्शन ही मुक्ति का मार्ग है

• सेक्स से भागना नहीं है, बल्कि उसमें जागना है

• ऊर्जा को दबाना नहीं, बल्कि समझना और रूपांतरित करना है

• शारीरिक से आध्यात्मिक तक की यात्रा स्वाभाविक है, जबरदस्ती नहीं

ॐ त त्सत्

काम ही जब रूपांतरित हो जाता है, तो वही राम बन जाता है।

Osho की 'Psychology of the Esoteric 2' का हिंदी विश्लेषण Pdf photo









 

Osho की 'Psychology of the Esoteric 1' का हिंदी विश्लेषण Pdf photo









 

गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

The Psychology of the Esoteric 2: ध्यान, साक्षी भाव और अस्तित्व से जुड़ाव (Osho के आधार पर एक संपूर्ण विश्लेषण मेरी दृष्टि मे )

  

📋 इस Article में:

  1. ध्यान क्या है? (मूल सिद्धांत)
  2. अभाषिक जीवन - शब्दों से परे
  3. ध्यानात्मक मन की प्रक्रिया
  4. प्रमुख चेतावनियाँ और सुझाव
  5. प्रेम, कामुकता और ध्यान
  6. निष्कर्ष

ध्यान क्या है? (मूल सिद्धांत)

इस पाठ का दर्शन पारंपरिक 'ध्यान विधियों' के बिल्कुल विपरीत है।

यह ध्यान को कार्य (Doing) के बजाय होने (Being) की अवस्था मानता है।

यह तकनीक नहीं, विकास है: चैतन्य में स्थिति है, आत्मा में स्थिति है, और आत्मा प्रकृति से परे है।

ध्यान कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसे आप बाहर से सीखकर अपने जीवन में जोड़ लें।

यह आपके व्यक्तित्व का एक आंतरिक उत्फुल्लन (flowering) और विकास है।

बुधवार, 29 अप्रैल 2026

Osho की 'Psychology of the Esoteric 1' का हिंदी विश्लेषण: Consciousness Development और Meditation Techniques"

 आंतरिक क्रांति: एक गहन विश्लेषण

यह ओशो का अत्यंत महत्वपूर्ण प्रवचन है जो मानव विकास और आध्यात्मिक रूपांतरण के मौलिक सिद्धांतों को रेखांकित करता है। आइए इसे परतों में समझते हैं।

1. विकास से क्रांति तक का संक्रमण

ओशो का मूल तर्क यह है कि मानव विकास का प्राकृतिक, अचेतन चरण समाप्त हो गया है।

 प्रकृति ने जो किया वह यांत्रिक और स्वचालित था—जीवों का क्रमिक विकास,  

लेकिन यह सचेतता के उदय के साथ रुक गया।

यह समझ क्यों महत्वपूर्ण है?

अचेतन विकास (जैविक विकास) में कोई अनिश्चितता नहीं थी। कारण-प्रभाव के नियम के अनुसार सब कुछ होता था।

 लेकिन चेतना के साथ अनिश्चितता आती है। अब आप चुन सकते हैं—विकसित हो सकते हैं या नहीं। यही क्रांति है।

मनुष्य पहली बार एक व्यक्तिगत जिम्मेदारी का वाहक बना। अब विकास सामूहिक नहीं रह गया; यह पूरी तरह व्यक्तिगत हो गया।

रविवार, 26 अप्रैल 2026

The Psychology of the Esoteric 12


 प्रश्न 4: आप पश्चिमी युवा विद्रोह (वेस्टर्न यूथ रिवोल्ट) के लिए किन कारकों (फैक्टर्स) को जिम्मेदार ठहराते हैं, और अब पश्चिम से इतने सारे युवा पूर्वी धर्म और दर्शन (ईस्टर्न रिलीजन एंड फिलॉसफी) में रुचि क्यों ले रहे हैं?


मन (माइंड) एक बहुत ही विरोधाभासी (कॉन्ट्राडिक्टरी) चीज़ है। यह ध्रुवीय विपरीतों (पोलर ऑपोजिट्स) में काम करता है। लेकिन हमारे सोचने का तार्किक (लॉजिकल) तरीका हमेशा एक हिस्से को चुनता है और दूसरे को नकारता (डिनाइज़) है। 


इसलिए तर्क (लॉजिक) एक अ-विरोधाभासी (नॉन-कॉन्ट्राडिक्टरी) तरीके से आगे बढ़ता है, और मन एक विरोधाभासी तरीके से काम करता है। मन विपरीतताओं (ऑपोजिट्स) में काम करता है, और तर्क रैखिक (लीनियरली) काम करता है।


The Psychology of the Esoteric 11

प्रश्न 1: कोई प्रश्न नहीं.......!


सैद्धांतिक (थियोरेटिकल) प्रश्न मत पूछो। सिद्धांत (थियोरीज़) कम समाधान (सॉल्व) करते हैं और अधिक भ्रमित (कन्फ्यूज़) करते हैं। यदि कोई सिद्धांत न हों, तो कम समस्याएँ होंगी। ऐसा नहीं है कि सिद्धांत प्रश्नों या समस्याओं का समाधान करते हैं। इसके विपरीत, प्रश्न सिद्धांतों से उत्पन्न (अराइज़) होते हैं।

और दार्शनिक (फिलॉसॉफिकल) प्रश्न मत पूछो। दार्शनिक प्रश्न केवल प्रश्न प्रतीत (सीम) होते हैं, लेकिन वे होते नहीं हैं। यही कारण है कि कोई उत्तर (आंसर) संभव नहीं हो पाया है। यदि कोई प्रश्न वास्तव में (रियली) प्रश्न है, तो वह उत्तर देने योग्य (आंसरेबल) है, लेकिन यदि वह असत्य (फाल्स) है, केवल एक भाषाई (लिंग्विस्टिक) भ्रम (कन्फ्यूज़न) है, तो उसका उत्तर नहीं दिया जा सकता।

 

The Psychology of the Esoteric 10


 प्रश्न 1: भारतीय दर्शन (इंडियन फिलॉसफी) में, परम सत्य (अल्टीमेट ट्रुथ) स्वरूप का वर्णन सत्यम (ट्रुथ), सुंदरम (ब्यूटी) और शिवम (गुडनेस) के रूप में किया गया है। क्या ये ईश्वर के लक्षण (कैरेक्टेरिस्टिक्स) हैं?


ये ईश्वर के गुण (क्वालिटीज़) नहीं हैं। बल्कि, ये ईश्वर के हमारे अनुभव (एक्सपीरियंसेस) हैं। ये वैसे दैवीय (डिवाइन) से संबंधित नहीं हैं; ये हमारी धारणाएँ (परसेप्शन्स) हैं। दैवीय, अपने आप में, अज्ञेय (अननोएबल) है। या तो यह हर गुण है, या बिल्कुल कोई गुण नहीं है। 

लेकिन जैसा मानव मन गठित (कॉन्स्टिट्यूटेड) है, यह दैवीय का अनुभव तीन खिड़कियों (विंडोज़) के माध्यम से कर सकता है: आप झलक (ग्लिम्प्स) या तो सुंदरता के माध्यम से, या सत्य के माध्यम से, या अच्छाई (गुडनेस) के माध्यम से प्राप्त कर सकते हैं। ये तीनों आयाम (डाइमेंशन्स) मानव मन के हैं।

 ये हमारी सीमाएँ (लिमिटेशन्स) हैं। ढाँचा (फ्रेम) हमारे द्वारा दिया गया है; दैवीय स्वयं ढाँचा-रहित (फ्रेमलेस) है। यह ऐसे ही है। हम खिड़की के माध्यम से आकाश (स्काई) देख सकते हैं। खिड़की आकाश के चारों ओर एक ढाँचे की तरह दिखती है, लेकिन आकाश का अपने चारों ओर कोई ढाँचा नहीं होता। यह अनंत (इनफिनिट) है। केवल खिड़की ही इसे एक ढाँचा देती है। उसी तरह, सुंदरता, सत्य और अच्छाई वे खिड़कियाँ हैं जिनके माध्यम से हम दैवीय में एक झलक पा सकते हैं।


The Psychology of the Esoteric 9


 प्रश्न 1: आप क्या सिखाते हैं और आपका सिद्धांत (डॉक्ट्रिन) क्या है?


मैं कोई सिद्धांत नहीं सिखा रहा हूँ। एक सिद्धांत सिखाना बल्कि अर्थहीन (मीनिंगलेस) है। मैं एक दार्शनिक (फिलॉसफर) नहीं हूँ; मेरा मन दर्शन-विरोधी (एंटीफिलॉसॉफिकल) है। दर्शन कहीं नहीं ले गया है और कहीं नहीं ले जा सकता। जो मन सोचता है, जो प्रश्न (क्वेश्चन) करता है, वह नहीं जान सकता।


इतने सारे सिद्धांत हैं। लेकिन एक सिद्धांत एक कल्पना (फिक्शन) है, एक मानवीय कल्पना। यह कोई खोज (डिस्कवरी) नहीं है, बल्कि एक आविष्कार (इन्वेंशन) है। मानव मन अनंत प्रणालियाँ (सिस्टम्स) और सिद्धांत बनाने में सक्षम है, लेकिन सिद्धांतों (थियोरीज़) के माध्यम से सत्य (ट्रुथ) को जानना असंभव है। एक मन जो ज्ञान (नॉलेज) से ठूंसा (स्टफ्ड) हुआ है, वह मन अज्ञानी (इग्नोरेंट) बने रहने के लिए बाध्य है।


The Psychology of the Esoteric 8


 प्रश्न 1: कृपया हमें सात शरीरों के तनावों (टेंशन्स) और विश्राम (रिलैक्सेशन) के बारे में कुछ बताएं।


सभी तनाव का मूल स्रोत (ओरिजिनल सोर्स) 'बनना' (बिकमिंग) है। मनुष्य सदा कुछ बनने (बिकम) का प्रयास कर रहा है; कोई भी अपने आप से वैसे ही सहज (एट ईज़) नहीं है जैसा वह है। 

सत्ता (बीइंग) को स्वीकार (एक्सेप्ट) नहीं किया जाता, सत्ता को नकार (डेनाइड) दिया जाता है, और कुछ और ही बनने के लिए एक आदर्श (आइडियल) के रूप में ले लिया जाता है। इसलिए मूल तनाव हमेशा उसके बीच होता है जो आप हैं और जो आप बनना चाहते हैं।


शनिवार, 25 अप्रैल 2026

The Psychology of the Esoteric 7


 प्रश्न 1: आपने कहा कि हमारे सात शरीर हैं: एक ईथरीय शरीर, एक मानसिक शरीर, इत्यादि। कभी-कभी भारतीय भाषा को पश्चिमी मनोविज्ञान की शर्तों में ढालना मुश्किल होता है। पश्चिम में इसके लिए हमारे पास कोई सिद्धांत नहीं है, तो हम इन विभिन्न शरीरों का अपनी भाषा में अनुवाद कैसे कर सकते हैं? आध्यात्मिक (स्पिरिचुअल) कोई समस्या नहीं है, लेकिन ईथरीय? सूक्ष्म (एस्ट्रल)?


शब्दों का अनुवाद किया जा सकता है, लेकिन उन स्रोतों से जहाँ आपने उन्हें खोजा नहीं है। जहाँ तक सतही चेतना से परे की खोज का सवाल है, जंग फ्रॉयड से बेहतर थे, लेकिन जंग भी केवल एक शुरुआत है। 

आप स्टाइनर के एंथ्रोपोसॉफी या थियोसोफिकल लेखन से इन चीजों के अर्थ की अधिक झलक प्राप्त कर सकते हैं: मैडम ब्लावात्स्की की सीक्रेट डॉक्ट्रिन, ईसिस अनवेल्ड और अन्य रचनाएँ, या एनी बेसेंट, लीडबीटर, कर्नल अलकॉट की रचनाएँ। आप रोज़ीक्रुशियन उपदेशों (डॉक्ट्रिन्स) से एक झलक प्राप्त कर सकते हैं। 

The Psychology of the Esoteric 6

प्रश्न 1: क्या आप समझा सकते हैं कि सपनों (ड्रीम्स) से आपका क्या अभिप्राय है?


हमारे सात शरीर होते हैं: भौतिक (फिजिकल), ईथरीय (एथेरिक), सूक्ष्म (एस्ट्रल), मानसिक (मेंटल), आध्यात्मिक (स्पिरिचुअल), ब्रह्मांडीय (कॉस्मिक) और निर्वाणिक।

 प्रत्येक शरीर के अपने प्रकार के सपने होते हैं।

 पश्चिमी मनोविज्ञान में भौतिक शरीर को चेतन (कॉन्शस) के नाम से जाना जाता है, ईथरीय शरीर को अचेतन (अनकॉन्शस) 

और सूक्ष्म शरीर को सामूहिक अचेतन (कलेक्टिव अनकॉन्शस) के नाम से।


The Psychology of the Esoteric 5


 प्रश्न 1: क्या शरीर और मन, पदार्थ और चेतना, भौतिक और आध्यात्मिक के बीच कोई विभाजन है? आध्यात्मिक चेतना प्राप्त करने के लिए कोई शरीर और मन को कैसे परातीत (ट्रान्सेंड) कर सकता है?


सबसे पहली बात जो समझनी चाहिए वह यह है कि शरीर और मन के बीच का विभाजन पूर्णतः झूठा (एब्सोल्यूटली फाल्स) है। यदि आप उस विभाजन से शुरुआत करते हैं, तो आप कहीं नहीं पहुँचेंगे; एक झूठी शुरुआत कहीं नहीं ले जाती। उससे कुछ भी नहीं निकल सकता क्योंकि प्रत्येक चरण (स्टेप) के विकसित (इवॉल्विंग) होने का अपना तर्क (लॉजिक) होता है। 


दूसरा चरण पहले से निकलेगा, और तीसरा दूसरे से, इत्यादि। एक तार्किक अनुक्रम (लॉजिकल सीक्वेंस) होता है। इसलिए जिस क्षण आप पहला कदम उठाते हैं, आपने एक तरह से सब कुछ चुन लिया होता है। पहला कदम अंतिम की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण है, शुरुआत अंत की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि अंत केवल एक परिणाम (आउटकम), एक विकास (ग्रोथ) है। 


The Psychology of the Esoteric 4

प्रश्न 1: कुंडलिनी योग क्या है और यह पश्चिम की कैसे मदद कर सकता है? आपकी कुंडलिनी जागरण की विधि पारंपरिक, नियंत्रित विधियों के बजाय अराजक क्यों है?


अस्तित्व ऊर्जा है, ऊर्जा का अनेक रूपों और अनेक प्रकारों में प्रवाह। जहाँ तक मानव अस्तित्व का संबंध है, यह ऊर्जा कुंडलिनी ऊर्जा है। कुंडलिनी मानव शरीर और मानव मन की केन्द्रित ऊर्जा है।


ऊर्जा या तो प्रकट रूप में विद्यमान हो सकती है या अप्रकट। वह बीज रूप में रह सकती है, या प्रकट रूप में आ सकती है। प्रत्येक ऊर्जा या तो बीज में होती है या प्रकट रूप में। कुंडलिनी का अर्थ है तुम्हारी संपूर्ण क्षमता, तुम्हारी संपूर्ण संभावना। लेकिन वह बीज है; वह संभावना है। कुंडलिनी जगाने के तरीकों का अर्थ है तुम्हारी संभावना को वास्तविकता बनाना।


The Psychology of the Esoteric 3


प्रश्न 1: कृपया हमें सेक्स ऊर्जा के आध्यात्मिक महत्व का वर्णन करें। हम सेक्स को कैसे उर्ध्वगामी (सब्लिमेट) और आध्यात्मिक (स्पिरिचुअलाइज़) कर सकते हैं? क्या सेक्स करना, प्रेम-मिलन (लव-मेकिंग), ध्यान के रूप में, चेतना के उच्च स्तरों की ओर एक उछाल-पट्टी (जंपिंग बोर्ड) के रूप में संभव है?


ऐसी कोई चीज़ नहीं है जैसे 'सेक्स ऊर्जा'। ऊर्जा एक और अभिन्न (वन एंड द सेम) है। सेक्स उसके लिए एक निकास (आउटलेट) है, उसके लिए एक दिशा है; यह ऊर्जा के अनुप्रयोगों (अप्लिकेशंस) में से एक है। जीवन ऊर्जा (लाइफ एनर्जी) एक है, लेकिन यह कई दिशाओं में प्रकट (मैनिफेस्ट) हो सकती है। सेक्स उनमें से एक है। जब जीवन ऊर्जा जैविक (बायोलॉजिकल) हो जाती है, तो वह सेक्स ऊर्जा बन जाती है।


The Psychology of the Esoteric 2

 


प्रश्न 1: ध्यान क्या है?


ध्यान कोई भारतीय पद्धति नहीं है; यह महज एक तकनीक नहीं है। आप इसे सीख नहीं सकते। यह एक विकास है: आपके संपूर्ण जीवन का विकास, आपके संपूर्ण जीवन से उत्पन्न होने वाला विकास। 

ध्यान ऐसी चीज़ नहीं है जिसे आप अपने वर्तमान स्वरूप में जोड़ सकें। यह आपके भीतर केवल एक मूलभूत परिवर्तन, एक उत्परिवर्तन (म्यूटेशन) के माध्यम से ही आ सकता है। यह एक विकास, एक उत्फुल्लन है। विकास हमेशा संपूर्णता से होता है, यह कोई बाहरी योग नहीं है। आपको ध्यान की ओर बढ़ना है।


The Psychology of the Esoteric 1 OSHO जुलाई 1970 से 1972 में मुंबई और मसूरी


 Inward revolution


प्रश्न 1: मनुष्य के विकास (एवोल्यूशन) के पथ पर, क्या यह संभव है कि भविष्य में किसी समय संपूर्ण मानवता (ह्युमैनिटी एज़ ए होल) प्रबुद्धता (एनलाइटनमेंट) प्राप्त कर सके? मनुष्य आज विकास के किस बिंदु पर है?


मनुष्य के साथ, विकास की प्राकृतिक, स्वचालित प्रक्रिया समाप्त हो जाती है। मनुष्य अचेतन (अनकॉन्शस) विकास की अंतिम संतान है। मनुष्य के साथ, सचेतन (कॉन्शस) विकास शुरू होता है। कई बातों पर ध्यान देना है।


पहली बात, अचेतन विकास यांत्रिक (मैकेनिकल) और प्राकृतिक (नेचुरल) है। यह अपने आप होता है। इस प्रकार के विकास के माध्यम से, चेतना (कॉन्शियसनेस) विकसित होती है। लेकिन जिस क्षण चेतना अस्तित्व में आती है, अचेतन विकास रुक जाता है क्योंकि उसका उद्देश्य पूरा हो चुका होता है। 

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2026

अक्षय उपनिषद 3

 प्रश्न 1: साईं बाबा और किसी अन्य गुरु के साथ कार्य करना


प्रश्न: "मुझे लगता है कि मैंने साईं बाबा के प्रति समर्पण कर दिया है, फिर भी मैं किसी अन्य शिक्षक या गुरु के साथ काम करने की आवश्यकता महसूस करता हूँ। क्या यह संभव है?"


पहली बात यह याद रखो कि गुरु वास्तव में कुछ करता नहीं है। वह है, उसकी उपस्थिति काम करती है, लेकिन उपस्थिति तभी काम कर सकती है जब तुममें विश्वास हो। यदि तुममें विश्वास नहीं है, तो कुछ नहीं किया जा सकता।


सच में, यदि तुम्हें लगता है कि तुमने साईं बाबा के प्रति समर्पण कर दिया है, तो मेरे पास आने की क्या आवश्यकता है? यदि समर्पण सच में हो गया है, तो दूसरे गुरु की माँग करना व्यर्थ है। मुझे तुम्हारे समर्पण पर, तुम्हारे विश्वास पर संदेह है, क्योंकि जब विश्वास हो जाता है तो और कुछ भी आवश्यक नहीं होता। और यदि कुछ और आवश्यक है, तो विश्वास नहीं हुआ है; तुम अभी भी खोज में हो। यदि तुम मुझ पर विश्वास नहीं कर सकते, तो काम करना असंभव है। ऐसा नहीं है कि मेरी कोई शर्तें हैं, मेरा दरवाजा बिना शर्त खुला है, लेकिन वह तुम्हारे लिए बंद रहेगा क्योंकि तुम उसे केवल तभी खुला देख सकते हो जब तुममें विश्वास हो।


यह अच्छा है यदि तुम साईं बाबा, या किसी और के साथ अंतरंग निकटता महसूस करते हो। यह अच्छा है। लेकिन फिर इधर-उधर मत भटको, फिर किसी और के पास मत जाओ, क्योंकि यह असंभव है। तुम्हारा विश्वास साईं बाबा के साथ बना रहता है, फिर कोई और कुछ नहीं कर सकता; यह असंभव है। लेकिन तुम निश्चित नहीं हो। तुम सोच रहे हो कि समर्पण हो गया है। यह नहीं हुआ है, क्योंकि फिर किसी और से सहायता माँगना बिल्कुल बेतुका है। और यदि तुम सहायता माँगते हो, तो समर्पण की आवश्यकता होगी। कारण यह है: मैं सकारात्मक रूप से कुछ नहीं कर सकता। मैं उपलब्ध हूँ। यदि तुम मुझ पर विश्वास करते हो, तो संपर्क बन जाता है।


यह बिल्कुल ऐसे ही है: प्रकाश है, लेकिन यदि तुम बंद आँखों से बैठे हो, तो प्रकाश तुम्हारी आँखें खोलने के लिए कुछ नहीं कर सकता। ऐसा नहीं है कि प्रकाश की तुम्हारे लिए कोई शर्तें हैं। वह उपलब्ध है, वह पहले से ही वहाँ है, वह पहले से ही स्वयं को तुम्हें दे रहा है, लेकिन तुम्हारी आँखें बंद हैं। और यदि तुम कहते हो, "इस कमरे में मैं अपनी आँखें नहीं खोल सकता, क्योंकि मैंने अपनी आँखें किसी दूसरे कमरे, किसी दूसरी रोशनी के प्रति समर्पित कर दी हैं," तो यहाँ तुम्हें अंधकार में ही रहना होगा। ऐसा नहीं कि प्रकाश उपलब्ध नहीं है, बल्कि तुम ग्रहणशील नहीं हो।


यदि तुम यहाँ आए हो, तो यह दिखाता है कि तुम सोचते हो कि तुम साईं बाबा पर विश्वास करते हो, लेकिन तुम विश्वास नहीं करते। तुम सोचते हो कि तुमने समर्पण कर दिया है, लेकिन तुम्हारी सोच गलत है, भ्रामक है। यदि तुमने समर्पण कर दिया है, तो साईं बाबा की ओर चले जाओ, अपने आप को उनके लिए खोलो ताकि वे काम कर सकें; फिर यहाँ-वहाँ खोजने मत जाओ। मैं सहायता करने को तैयार हूँ, लेकिन उसके लिए तुम्हें ग्रहणशील होना होगा। मैं तुम्हारे प्रति आक्रामक नहीं हो सकता, कोई नहीं हो सकता। ऐसी आक्रामकता के साथ काम करना असंभव है। यदि तुम मुझ पर विश्वास करते हो, तो कुछ संभव हो जाता है। तब बिना किसी आक्रामकता के काम शुरू हो जाता है। यदि तुम विश्वास नहीं करते, तो मैं केवल तुम्हारे प्रति हिंसक हो सकता हूँ, मुझे तुम्हारी आँखें जबरदस्ती खोलनी होंगी। यह नहीं किया जा सकता। तुम्हें निर्वाण के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, तुम केवल उसमें प्रवाहित हो सकते हो।


यदि तुम मेरी नदी पर विश्वास नहीं करते, तो मेरे साथ कैसे बह सकते हो? तब गहरे में तुम संघर्ष कर रहे होगे; तब तुम अपना समय बर्बाद करोगे, मेरा समय बर्बाद करोगे, और यह बेकार है। इसलिए इस बारे में स्पष्ट हो जाओ। यह केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं हो सकता, यह तुममें से कई लोगों का हो सकता है। तुम्हारा दिल कहीं और है? – तो वहाँ चले जाओ। जहाँ भी तुम्हारा दिल है, वहाँ रहो। यदि तुम्हारा दिल मेरे साथ है, तभी कुछ संभव है; अन्यथा अपना समय और ऊर्जा बर्बाद मत करो। यह स्पष्ट रूप से समझा जाना चाहिए।


तुम्हारा विश्वास मतलब है कि तुम खुले हो। तुम्हारा विश्वास मतलब है कि अब तुम अज्ञात में, अज्ञात मार्गों में जाने के लिए तैयार हो। यदि तुम मुझ पर विश्वास नहीं करते, तो तुम मेरे साथ कैसे चल सकते हो? और तुम मुझे जो कहते हो, वह मेरे लिए महत्वहीन है, लेकिन तुम्हारे लिए नहीं। चाहे तुम मुझे बिलव्ड मास्टर कहो या नहीं, यह मेरे लिए समान है, लेकिन तुम्हारे लिए समान नहीं है, क्योंकि तुम्हारी भावना बहुत सी चीजें तय करेगी। यदि तुम साईं बाबा के अलावा किसी और को बिलव्ड मास्टर नहीं कह सकते, तो उनके पास चले जाओ, क्योंकि तब वही तुम्हारा मंदिर है, और केवल उनकी उपस्थिति में ही तुम रूपांतरित होगा। और इसमें कुछ भी गलत नहीं है।


लेकिन तुम यहाँ आए हो। यह दिखाता है कि स्पर्श नहीं हुआ है; तुम गहरी, अंतरंग निकटता में नहीं चले गए हो। रिश्ता नहीं हुआ है, प्रेम नहीं हुआ है। तुम अपने आप को धोखा देते रह सकते हो। इससे अधिक मदद नहीं मिलेगी। इसलिए स्पष्ट हो जाओ, अपने मन का विश्लेषण करो। यदि तुम्हारा दिल यहाँ है, तो संभावनाएँ हैं। यदि तुम्हारा दिल यहाँ नहीं है, तो जहाँ भी तुम्हारा दिल ले जाए, वहाँ चले जाओ।


मैं जानता हूँ, तुम्हें वापस आना होगा, क्योंकि तुम साईं बाबा के साथ रहे हो, जैसा कि तुमने इस पत्र में कहा है, और वहाँ कुछ नहीं हुआ। तुम यहाँ हो, और मैं जानता हूँ कि अब तुम किसी दूसरे शिक्षक के पास चले जाओगे, और वहाँ तुम कहोगे कि तुम मेरे साथ रहे हो और कुछ नहीं हुआ। और तुम यहाँ मेरे साथ नहीं हो! केवल शारीरिक रूप से यहाँ होने का कोई मतलब नहीं है।


मैं जानता हूँ कि साईं बाबा के साथ भी ऐसा ही रहा होगा। तुम वहाँ शारीरिक रूप से रहे हो, जैसे यहाँ हो, लेकिन यह शारीरिक उपस्थिति का सवाल नहीं है, यह आंतरिक खुलने का सवाल है। तब तुम किसी दूसरे ग्रह पर हो सकते हो और मैं काम कर सकता हूँ। तुम्हारा यहाँ होना आवश्यक नहीं है; स्थान का कोई मतलब नहीं है, न ही समय का कोई मतलब है। तुम किसी दूसरे ग्रह पर हो सकते हो, तुम किसी दूसरे समय में हो सकते हो, लेकिन यदि तुम ग्रहणशील हो तो तुम यहाँ मेरे निकट हो। तुम अभी यहाँ हो सकते हो, इसी क्षण विद्यमान हो सकते हो, लेकिन यदि तुम्हारा दिल यहाँ नहीं है, तो किसी पुल की कोई संभावना नहीं है।


बहुत से लोग हैं जो एक गुरु से दूसरे गुरु के पास भटकते रहते हैं। कुल परिणाम केवल भ्रम हो सकता है, क्योंकि प्रत्येक गुरु अपने तरीके से काम करता है, उसके अपने तरीके होते हैं, और तुम जानकारी इकट्ठा करते रहते हो। वह जानकारी विरोधाभासी होने के लिए बाध्य है। तब तुम भ्रमित हो जाओगे, तुम पागल भी हो सकते हो। एक गुरु से चिपके रहना और अपना दिल पूरी तरह उसे देना बेहतर है। यदि तब भी कुछ नहीं होता, तो चले जाओ। लेकिन उस गुरु के साथ समाप्त हो जाओ, अधूरे रिश्ते में मत रहो। समाप्त हो जाओ। या तो तुम रूपांतरित हो जाओ, या तुम जान जाओ कि यह गुरु तुम्हारे लिए नहीं है। तब रिश्ता टूट गया है, कोई अपूर्णता नहीं है। तब तुम अपने पूरे दिल के साथ दूसरे गुरु के पास जा सकते हो।


अब तुम यहाँ हो और तुम साईं बाबा के बारे में सोच रहे हो। यह विभाजन एक बाधा बन जाएगा। पहले साईं बाबा के पास वापस जाओ, उनके साथ समाप्त हो जाओ। या तो तुम रूपांतरित हो जाओ, तब किसी को खोजने की आवश्यकता नहीं है; या सिद्ध हो जाता है कि साईं बाबा तुम्हारे गुरु नहीं हैं। तब मेरे पास आना।


और यही बात मेरे अपने शिष्यों पर भी लागू होती है। यदि तुम यहाँ मेरे साथ हो, तो मेरे साथ समाप्त हो जाओ। मेरे साथ पूरी तरह से रहो, ताकि या तो कायापलट हो जाए और फिर किसी को खोजने या कहीं जाने की आवश्यकता न रहे, या तुम्हें एहसास हो जाए, "यह व्यक्ति मेरे लिए नहीं है।" तब तुम मुझे पूरी तरह से छोड़ सकते हो, तब तुम चले जा सकते हो, तब कहीं और... लेकिन यहाँ अधूरे मन से मेरे साथ रहना और फिर अधूरे मन से किसी और के पास जाना ठीक नहीं होगा। बल्कि, यह खतरनाक हो सकता है। तुम इतने विभाजित हो सकते हो, इतने टुकड़ों में बँट सकते हो, तुम्हारे भीतर इतनी सारी आवाज़ें हो सकती हैं कि तुम एक भीड़ बन सकते हो। यह पहले ही कई लोगों के साथ हो चुका है। वे बहुत अधिक जानते हैं और उन्होंने इतने सारे स्रोतों से पीया है कि अब वे यह निर्णय नहीं कर सकते कि वे कहाँ खड़े हैं, वे कौन हैं। और वे अधिक भ्रम पैदा करते रहते हैं।


धैर्य की आवश्यकता है। यदि तुम पूरी तरह से एक गुरु के प्रति समर्पित हो, तो बात होना निश्चित है। और मैं कहूंगा कि भले ही गुरु सच्चा न हो, यदि तुम पूरी तरह से समर्पित हो तो बात हो सकती है – क्योंकि घटना गुरु के माध्यम से नहीं होती, वह पूर्ण समर्पण के माध्यम से होती है। इसलिए भले ही एक मृत गुरु, या एक गुरु जो कभी अस्तित्व में ही नहीं था, केवल नाम, काम करेगा। वास्तविक रसायन, परिवर्तन का विज्ञान, तुम्हारे भीतर है। गुरु अधिक से अधिक केवल एक उत्प्रेरक एजेंट है, इससे अधिक कुछ नहीं।


अपने गुरु के पास वापस जाओ और उनके साथ रहो। और उनका न्याय करने की कोशिश मत करो; तुम्हारे पास किसी का न्याय करने का कोई तरीका नहीं है। तुम केवल इतना कर सकते हो कि अपना पूरा दिल उन्हें दे दो। और तुम्हें खोने के लिए क्या मिला है? तो इतना डर क्यों? तुम्हारे पास खोने के लिए कुछ नहीं है, तो इतना अविश्वास क्यों? अपने आप को पूरी तरह दे दो। बस यह पूरी तरह देना तुम्हारे रूपांतरण का आधार बन जाता है। कई बार ऐसा हुआ है कि एक शिष्य एक गुरु के माध्यम से रूपांतरित हुआ जो बिल्कुल भी गुरु नहीं था। और कई बार इसके विपरीत भी हुआ है: गुरु सच्चा था लेकिन शिष्य रूपांतरित नहीं हुआ। अंतिम चीज तुम पर निर्भर करती है, मुझ पर नहीं। तुम निर्णायक कारक हो।


इसलिए जहाँ भी जाओ, इसे एक नियम बना लो: अपने पूरे दिल से जाओ। अन्यथा तुम हर जगह खाली हाथ चले जाओगे। और जितना अधिक तुम चलोगे, जितना अधिक तुम इस गुरु और उस गुरु के पास जाओगे, उतना ही अधिक भ्रम होगा, दुख होगा, और अंततः तुम निर्णय कर सकते हो कि कोई ऐसा नहीं है जो तुम्हें रूपांतरित कर सके। या, तुम इस निष्कर्ष पर पहुँच सकते हो कि रूपांतरण जैसी कोई चीज नहीं है, यह सब धोखा है। और कारण केवल यही होगा – कि तुम कभी भी कहीं भी अपने पूरे दिल से नहीं थे।


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प्रश्न 2: क्या साधना में तर्क या बुद्धि का कोई स्थान है?


प्रश्न: "बिलव्ड ओशो, क्या साधना में तर्क या बुद्धि का बिल्कुल कोई स्थान है?"


केवल इतना सा: कि तर्क को तुम्हें यह दिखाना है कि तर्क व्यर्थ है, तर्क को आत्महत्या करनी है – केवल इतना सा। सबसे बड़े तिब्बती रहस्यवादियों में से एक, मारपा के बारे में कहा जाता है... किसी ने उससे पूछा, "क्या शास्त्र मदद नहीं कर सकते?" उसने कहा, "वे कर सकते हैं। वे तुम्हें शास्त्रों से परे जाने में मदद कर सकते हैं। यही उनका एकमात्र उपयोग है। शास्त्र पढ़ो, उनका अध्ययन करो; वे तुम्हें यह समझने में मदद करेंगे कि शास्त्र व्यर्थ हैं, और सत्य उनके माध्यम से प्राप्त नहीं किया जा सकता है।"


तर्क केवल इसी तरह तुम्हारी मदद कर सकता है। तर्क करो, विश्लेषण करो, बहस करो, और इस पूरे प्रयास के माध्यम से तुम यह समझने आओगे कि तर्क तुम्हें सत्य तक नहीं ले जा सकता। लेकिन यह सबसे बड़ी संभावनाओं में से एक है। एक बार जब तुम इसका एहसास कर लेते हो, तो तुम तर्क को गिरा सकते हो, और जब तर्क गिर जाता है, तो पहली बार तुम अपने अस्तित्व के एक बिल्कुल भिन्न केंद्र – हृदय – से कार्य करना शुरू करते हो। और हृदय विश्वास कर सकता है। तर्क कभी विश्वास नहीं कर सकता, तर्क स्वभाव से अविश्वासी है। याद रखो, तर्क विश्लेषण कर सकता है, लेकिन कभी संश्लेषण नहीं कर सकता। तर्क काट और विभाजित कर सकता है, लेकिन कभी एकता या सामंजस्य नहीं बना सकता। तर्क कैंची की तरह है, कैंची काट और विभाजित कर सकती है।


एक बार ऐसा हुआ कि किसी ने बयाजिद, एक सूफी संत, को सोने की कैंची भेंट की। वे बहुमूल्य थीं, उन सोने की कैंचियों पर कुछ हीरे थे, और उन्हें भेंट करने वाला व्यक्ति बहुत खुश था कि यह एक दुर्लभ, अद्वितीय उपहार है। लेकिन बयाजिद ने कहा, "इन्हें वापस ले जाओ, क्योंकि मेरा पूरा अस्तित्व काटना नहीं है, विश्लेषण करना नहीं है, विभाजित करना नहीं है। बल्कि, तुम मेरे लिए एक सुई और कुछ धागा लाओ, क्योंकि संश्लेषण मेरा लक्ष्य है। मैं चीजों को जोड़ना चाहता हूँ, उन्हें अलग नहीं करना चाहता। सोने की हो या नहीं," बयाजिद ने कहा, "एक सुई चलेगी। कैंची बहुत मूल्यवान हो सकती है लेकिन वे मेरे लिए नहीं हैं।"


तर्क कैंची की तरह है: यह काटता है, विभाजित करता है, विश्लेषण करता है। इसीलिए विज्ञान तर्क के बिना नहीं चल सकता। यह संदेह करता है, यही इसका मूल कार्य है। यह अच्छा है – एक विशेष उद्देश्य के लिए यह अच्छा है। जहाँ तक पदार्थ का सवाल है, जहाँ तक बाहरी दुनिया का सवाल है, तर्क ही विधि है। विज्ञान तर्क के बिना नहीं चल सकता, क्योंकि विज्ञान विश्लेषण है, विच्छेदन है। इसीलिए विज्ञान अंततः परमाणु तक पहुँच गया, अंतिम विभाजन तक। और अब उन्होंने परमाणु को भी विभाजित कर दिया है, और वे इलेक्ट्रॉन तक पहुँच गए हैं। वे विभाजित करते रहेंगे।


विज्ञान परमाणु तक पहुँचता है, और धर्म दिव्य तक पहुँचता है। धर्म चीजों को एक साथ जोड़ता रहता है, और अंतिम एकता ईश्वर है। समग्रता को अंदर ले लिया गया है। धर्म तर्क के साथ काम नहीं कर सकता, जिस तरह विज्ञान विश्वास के साथ काम नहीं कर सकता। यदि तुम वैज्ञानिक हो तो तुम्हें संदेह करना होगा, संदेह ही आधार है। लेकिन धर्म में, यदि तुम संदेह करते हो तो तुम हार गए। धर्म में तुम्हें विश्वास करना होगा।


ये आयाम बिल्कुल विपरीत हैं। विज्ञान बाहर की ओर चलता है, धर्म भीतर की ओर चलता है। वे बिल्कुल विपरीत चलते हैं, उनके आयाम विपरीत हैं, इसलिए स्पष्ट रूप से धर्म वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विपरीत होना चाहिए। विज्ञान का अर्थ है तर्क, संदेह; धर्म का अर्थ है विश्वास, श्रद्धा। इसलिए तुम्हारा तर्क केवल एक ही काम कर सकता है, और वह है यह एहसास करना कि तर्क साधना की दुनिया में, आंतरिक अनुशासन की दुनिया में अधिक सहायक नहीं होगा। फिर उसे गिरा दो और अपने अस्तित्व के एक दूसरे केंद्र, हृदय को कार्य करने दो।


जब हृदय कार्य करना शुरू करता है, तो तुम्हारे चारों ओर एक अलग दुनिया होगी – क्योंकि तुम अपनी दुनिया बनाते हो। यदि तुम संदेह कर रहे हो, तो तुम एक ऐसी दुनिया बनाते हो जो संदेह, अवसाद, उदासी, अंधकार से भरी है। यदि तुम हृदय के माध्यम से काम करते हो, तो तुम एक अलग दुनिया बनाते हो – प्रकाशमानता, प्रेम, प्रार्थना, आनंद की – लेकिन वह पूरी तरह से अलग है। और तुम एक दुनिया से दूसरी दुनिया में नहीं बदल सकते, तुम्हें एक केंद्र से दूसरे केंद्र में बदलना होगा। और ये केंद्र तुम्हारे भीतर हैं, वह केंद्र जो संदेह करता है और वह केंद्र जो विश्वास करता है।


जब तुम प्यार में पड़ते हो, तो तर्क का क्या उपयोग है? तुम प्यार में पड़ते समय अपने तर्क का उपयोग कैसे कर सकते हो? इसीलिए तर्क कहता है कि यह एक पतन है: "प्यार में गिरना (फॉलिंग इन लव)"। इस शब्दावली को किसने बनाया, "फॉलिंग इन लव"? "राइजिंग इन लव" क्यों नहीं? तर्क ने प्रेम की निंदा की है, तर्क कहता है कि यह एक पतन है। और एक तरह से यह है, क्योंकि सिर से तुम हृदय में गिरते हो। तुम एक अलग केंद्र से कार्य करना शुरू करते हो। लेकिन प्यार में तुम अपने तर्क का उपयोग कैसे कर सकते हो? क्या इसका उपयोग करने का कोई तरीका है? यदि तुम इसका उपयोग करते हो, तो तुम पूरी घटना को नष्ट कर दोगे। पहली बात जो तर्क कहेगा, वह है, "संदेह करो!" पहली बात जो तर्क कहेगा, वह है, "क्या अस्तित्व में कोई चीज है जिसे तुम प्रेम कह सकते हो? क्या प्रेम जैसी कोई चीज है? उसका विच्छेदन करो।" और यदि तुम विच्छेदन करते हो, तो प्रेम गायब हो जाता है।


प्रेम एक एकता है और एक बहुत ही नाजुक सामंजस्य है; इसका विच्छेदन नहीं किया जा सकता। यह बिल्कुल एक छोटे बच्चे की तरह है जो उछल रहा है, नाच रहा है, आनंद ले रहा है। वह जीवित है। तुम बच्चे को काटो, उसका विच्छेदन करो; उसे एक मेज पर रखो, एक सर्जन की मेज, और यह पता लगाने के लिए उसका विच्छेदन करो कि जीवन कहाँ है, वह क्या थी जो जीवित थी – तुम उसे नहीं पाओगे। ऐसा नहीं कि वह वहाँ नहीं थी; जिस तरह से तुम उसे खोजने की कोशिश कर रहे हो, उसका मतलब है कि तुम चूक जाओगे, विधि ही मना करती है। जैसे ही तुम बच्चे का विच्छेदन करते हो, वह मर जाता है, जीवन गायब हो जाता है, और विच्छेदन करके तुम मृत्यु पर आओगे, जीवन पर नहीं।


विज्ञान अंततः मृत्यु की ओर ले जाता है – हिरोशिमा और नागासाकी आकस्मिक नहीं हैं। और यदि मनुष्य अभी भी एक और सदी के लिए विज्ञान का अनुसरण करता है... यहाँ तक कि एक सदी बहुत आशावादी है; आने वाले पच्चीस वर्ष... यदि मनुष्य लगातार विज्ञान का अनुसरण करता है, तो यह एक वैश्विक आत्महत्या साबित हो सकता है, क्योंकि विच्छेदन जीवन की ओर नहीं ले जा सकता; अंतिम परिणाम मृत्यु होना तय है। और विज्ञान जीवन पर विश्वास नहीं कर सकता, क्योंकि तुम इसे कहीं भी, किसी भी प्रयोगशाला में नहीं पा सकते। तुम विच्छेदन करते हो, और जीवन गायब हो जाता है। तुम अपने प्रियतम का विच्छेदन करते हो, और प्रेम गायब हो जाता है। तुम एक सर्जन के पास जाते हो और उसे अपने दिल का विच्छेदन करने देते हो, या यह पता लगाने के लिए अपने दिल का एक्स-रे लेने देते हो कि क्या प्रेम है या नहीं। वह वहाँ एक कैंसर पा सकता है, लेकिन वह प्रेम नहीं पा सकता। मृत्यु का पता लगाया जा सकता है, प्रेम का पता नहीं लगाया जा सकता। प्रेम का कोई एक्स-रे लेने का कोई तरीका नहीं है। मृत्यु का पता लगाया जा सकता है; यदि टीबी है, यदि कैंसर है, तो इसका पता लगाया जा सकता है, विज्ञान इसे खोज सकता है।


एक पुस्तकालय में जाओ और स्वास्थ्य की परिभाषा खोजने के लिए चिकित्सा विश्वकोशों को देखो। तुम इसे नहीं पाओगे। तुम हर बीमारी को परिभाषित पाओगे, लेकिन तुम स्वास्थ्य की कोई परिभाषा नहीं पा सकते। विज्ञान स्वास्थ्य को परिभाषित नहीं कर सकता, क्योंकि स्वास्थ्य का पता नहीं लगाया जा सकता। यदि तुम डॉक्टर के पास जाते हो, तो वह तुम्हें बता सकता है कि तुम बीमार हो, लेकिन वह तुम्हें एक प्रमाण पत्र नहीं दे सकता कि तुम स्वस्थ हो। वह तुम्हें एक प्रमाण पत्र दे सकता है कि तुम बीमार नहीं हो – यह दूसरी बात है, नकारात्मक; वह तुम्हें एक प्रमाण पत्र नहीं दे सकता कि तुम स्वस्थ हो। और कोई परिभाषा नहीं है कि स्वास्थ्य क्या है।


विज्ञान एक विधि के साथ लड़ता रहता है, वही विधि विज्ञान की दुनिया बनाती है। धर्म उस विधि के साथ काम नहीं करता है। धर्म एक अलग प्रकार की पद्धति के माध्यम से काम करता है – हृदय ही केंद्र है। और यदि तुम सिरहीन हो सकते हो, तभी धर्म तुम्हारे लिए कुछ सार्थक है। यदि तुम बहुत अधिक सिर में हो, तो धर्म तुम्हारे लिए नहीं है। यदि तुम बहुत अधिक सिर में हो, तो प्रार्थना बहुत दूर है, प्रेम भी असंभव है। तुम लोगों का शोषण कर सकते हो, तुम उन्हें मार सकते हो, लेकिन तुम तर्क के माध्यम से उनसे प्रेम नहीं कर सकते। या, तर्क ऐसे धोखे पैदा कर सकता है।


मैं पीनट्स जोक-बुक देख रहा था। चार्ली ब्राउन वहाँ कहता है, "मैं मानवता से प्रेम करता हूँ; यह लोग हैं जिन्हें मैं बर्दाश्त नहीं कर सकता।" "मैं मानवता से प्रेम करता हूँ; यह लोग हैं जिन्हें मैं बर्दाश्त नहीं कर सकता।" सिर मानवता से प्रेम कर सकता है, क्योंकि मानवता जैसा कोई नहीं है। तुम्हें मानवता कहीं नहीं मिलेगी। तुम जहाँ भी जाओगे, लोग मिलेंगे, और सिर लोगों को बर्दाश्त नहीं कर सकता।


एक देश से प्रेम करना, मानवता से प्रेम करना, राष्ट्र से प्रेम करना, ईसाई धर्म से प्रेम करना, इस्लाम से प्रेम करना, हिंदू धर्म से प्रेम करना आसान है। एक वास्तविक व्यक्ति से प्रेम करना बहुत कठिन है, बहुत कठिन, क्योंकि वास्तविक व्यक्ति के लिए हृदय की आवश्यकता होगी। और ये अवधारणाएँ, अमूर्त अवधारणाएँ – मानवता, हिंदू धर्म, इस्लाम, ईसाई धर्म, या यहाँ तक कि ईश्वर – सिर काम कर सकता है, कोई समस्या नहीं है, क्योंकि केवल सोचने का तात्पर्य है, किसी जीवित अनुभव की आवश्यकता नहीं है। तुमसे किसी ऐसी चीज में शामिल होने को नहीं कहा जाता जहाँ तुम्हारे हृदय की आवश्यकता होगी: केवल अवधारणाएँ, केवल तर्क, गणित। सिर वह कर सकता है। विज्ञान सिर का काम है; धर्म हृदय का काम है। तुम अपने तर्क का उपयोग केवल तर्क को नष्ट करने के लिए, तर्क को आत्महत्या करने में मदद करने के लिए कर सकते हो। मेरा पूरा प्रयास तुम्हें सिरहीन बनने के लिए राजी करना है।


सिर के बिना जियो, तब तुम्हारा जीवन उस जीवन से पूरी तरह से अलग होगा जो तुम जी रहे हो। जो जीवन तुम जी रहे हो, वह बिल्कुल वैसा ही है जैसा पुराने शास्त्रों में नरक को परिभाषित किया गया है। और यदि तुम नरक में जाओगे, तो तुम यह पहचानने में सक्षम नहीं हो सकते कि यह नरक है; तुम सोचोगे कि यह पुरानी दुनिया का एक विस्तार मात्र है। तुम वह सब कुछ पाओगे जो तुम्हारे पास पहले से है, नरक अब तुम्हें कुछ भी नया नहीं दे सकता। मनुष्य ने सब कुछ यहीं इस धरती पर बनाया है। अपने तर्क को आत्महत्या करने में सहायता करो। भीतर हृदय में गिरो। प्रेम, प्रार्थना, ध्यान को अपनी दुनिया का केंद्र बनने दो।


लेकिन शुरुआत में सहायता की आवश्यकता होगी, क्योंकि शुरुआत में तुम और कुछ नहीं कर सकते – तुम वहाँ हो, सिर में विद्यमान हो। इसलिए मैं इतनी बात करता रहता हूँ। ये बातें बेकार हैं, इनकी आवश्यकता नहीं है, लेकिन तुम सिर में विद्यमान हो, इसलिए किसी तरह तुम्हें बाहर निकलना होगा। मैं तुम्हें सिद्धांत नहीं दे रहा हूँ, मैं तुम्हें सोचने के लिए कुछ सामग्री नहीं दे रहा हूँ। मैं बस तुम्हारे तर्क को एक ऐसे बिंदु पर पहुँचने में मदद कर रहा हूँ जहाँ वह स्वयं एहसास करे कि केवल तर्क में जीना जीवन को उसकी समग्रता में खोना है।


शुरुआत में इसकी आवश्यकता है। पहला कदम सिर से बाहर निकाला जाना है, इसलिए सिर से संपर्क करना होगा। जैसे ही तुमने वह पहला कदम उठा लिया, फिर कोई आवश्यकता नहीं है। लेकिन पहला कदम सबसे कठिन है। तुम तर्क से इतने ग्रस्त हो कि जो कुछ भी कहा जाता है, तुम्हारा तर्क उसके चारों ओर काम करना शुरू कर देता है। तुम यहाँ जो कुछ भी पढ़ते हो, वह तुम्हारे तर्क के लिए भोजन बन जाता है।


धार्मिक प्रवचन वास्तव में जहर हैं, वे जहरीला भोजन हैं। बुद्ध बात करते हैं, कृष्ण बात करते हैं, लाओ त्ज़ु शिष्यों को उपदेश देते रहते हैं। वे क्या कर रहे हैं? वे केवल एक ही काम कर रहे हैं: वे तुम्हें वह जहर दे रहे हैं जो तर्क को भोजन जैसा लगता है। तर्क तुरंत इसे अवशोषित कर लेता है, लेकिन यह जहर है, और तर्क को मरना होगा। और एक बार तर्क मर जाने के बाद, पहली बार तुम सतर्क, सचेतन, जाग्रत होगे, और तुम पूरी दुनिया को एक नई रोशनी में देखोगे।


दुनिया वही रहती है लेकिन तुम अलग हो, तुम बदल गए हो। अब तुम अलग आँखों से देख सकते हो। तब यह दुनिया बुरी नहीं है; तब दुनिया में कोई दुख नहीं है। तब पूरी दुनिया बस शिव का नृत्य है, सिर्फ एक दिव्य उत्सव। और पूरा जीवन एक लीला है। इसीलिए हिंदुओं ने इसे लीला कहा है: लीला का मतलब है खेल, दिव्य ऊर्जा का एक खेल।


हिंदुओं ने कहा है कि यह एक सृष्टि नहीं है, यह एक खेल है। यह एक गंभीर बात नहीं है, यह सरल खेल है – बहुत अधिक ऊर्जा का एक खेल। लेकिन अभी तुम उस तरह से नहीं सोच सकते, वह दरवाजा बंद है। तर्क को एक तरफ रखो, प्रेमपूर्ण तरीके से कार्य करना शुरू करो। अपने व्यवहार में, अपने कार्यों में, अपनी गतिविधियों में अधिक हृदय लाओ। तब कृष्ण और यीशु और लाओ त्ज़ु ने जो कुछ भी कहा है, वह तुम्हारे लिए एक सत्य बन जाएगा, यह प्रकट हो जाएगा। तुम्हें केवल ताज़ी आँखों की आवश्यकता है जो इसे देख सकें, इसलिए विश्वास पर इतना जोर।


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प्रश्न 3: यदि ईश्वर यहीं और अभी है, तो हम उसे क्यों नहीं देख पाते?


प्रश्न: "बिलव्ड ओशो, यदि ईश्वर यहीं और अभी है, तो हमें उसे देखने से क्या रोकता है? हम अपने सपनों के जीवन से क्यों चिपके रहते हैं, भले ही वह हमारे लिए दुख बन गया है?"


नहीं, यह अभी तक तुम्हारे लिए दुख नहीं बना है, अन्यथा तुम उससे चिपके नहीं रह सकते थे। कोई भी दुख से चिपक नहीं सकता। तुम्हें अभी भी आशाएँ हैं, तुम अभी तक पूरी तरह से निराश नहीं हुए हो। अपने दुख में भी तुम आशा कर रहे हो। तुम सोच रहे हो कि आज दुख है लेकिन कल स्वर्ग के द्वार खुलेंगे, और यह दुख कल उस स्वर्ग तक पहुँचने का एक साधन मात्र है। जब तक कल पूरी तरह से नहीं मर जाता, जब तक कल पूरी तरह से गिर नहीं जाता, जब तक तुम पूरी तरह से निराश नहीं हो जाते... कोई आशा नहीं... तभी तुम देखोगे कि जहाँ तुम रह रहे हो, वहाँ कैसा दुख है। और एक बार जब तुम उस दुख के प्रति जागरूक हो जाते हो जिसे तुम जी रहे हो, तो तुम उसे गिरा दोगे – मेरे लिए तुम्हें बताने की कोई आवश्यकता नहीं होगी।


कोई बुद्ध के पास आया और उसने पूछा, "तुम कहते रहते हो कि जीवन दुख है, दुःख है; तुम कहते रहते हो कि घर में आग लगी है, और मुझे एहसास है कि ऐसा ही है, लेकिन हमें उस घर से कैसे बाहर निकलना चाहिए जिसमें आग लगी है?"


बुद्ध ने कहा, "तुम यह नहीं देख रहे हो कि घर में आग लगी है। यदि घर में आग लगी होती, तो तुम मुझसे पूछने नहीं आते, तुम बस उस घर से बाहर कूद जाते।" तुम तकनीकें सीखने के लिए गुरु खोजने नहीं जाते, तुम यह पता लगाने के लिए बाइबिल और कुरान से सलाह नहीं लेते कि उस घर से कैसे बाहर निकला जाए जिसमें आग लगी है। जब घर में आग लगती है, तो तुम अपनी कुरान और बाइबिल अंदर छोड़ दोगे, और तुम बाहर कूद जाओगे। और भले ही कोई बुद्ध वहाँ बैठा हो, तुम तभी याद करोगे जब तुम घर से बाहर होगे कि बुद्ध अंदर रह गए, गुरु अंदर रह गए। जब तुम्हें एहसास होता है कि घर में आग लगी है, तो तुम बस उससे बाहर कूद जाते हो; कोई विधि नहीं है।


सभी विधियाँ टालमटोल हैं। तुम एक विधि की खोज में हो ताकि तुम टाल सको, क्योंकि एक विधि में समय लगेगा, तो तुम अपने आप से कह सकते हो, "मैं अभी कैसे कूद सकता हूँ? इसमें तीन साल, छह साल, जन्म लगेंगे, अभ्यास करने में। यह इतनी कठिन बात है, तो मैं पहले अभ्यास करूंगा कि कैसे कूदना है, और फिर कूदूंगा। लेकिन जब तक मैं अभ्यास नहीं करता, मैं कूद नहीं सकता।"


और तुम यह अभ्यास, यह पूर्वाभ्यास कई जन्मों से कर रहे हो। तुम पहली बार मुझसे पूछने नहीं आए हो – तुमने कई बार पूछा है। तुम हर जन्म में वही प्रश्न पूछते रहे हो, लेकिन तुम कभी कुछ नहीं करते, क्योंकि बुद्ध कह सकते हैं कि घर में आग लगी है, लेकिन तुम देखते हो... यह एक महल है, कुछ भी नहीं जल रहा है। बुद्ध के प्रति सम्मान के कारण तुम उनका खंडन नहीं करते। अन्यथा तुम जानते हो कि वह पागल है; घर में आग नहीं लगी है। या वह प्रतीकों में बात कर रहा हो सकता है, वह कुछ और कह रहा हो सकता है। या वह इतना महान व्यक्ति है कि तुम समझ नहीं सकते कि वह क्या कह रहा है, इसलिए केवल सम्मान के कारण तुम उसका खंडन नहीं करते, तुम हाँ कहते हो। तुम्हारी हाँ तुम्हारे ना से अधिक अर्थ नहीं रखती। तुम्हारी हाँ, तुम्हारा ना अर्थहीन हैं।


मैंने सुना है कि मुल्ला नसरुद्दीन एक स्त्री से प्रेम करता था, लेकिन बहुत चिंतित, उदास, हमेशा दुखी था, तो एक दोस्त ने पूछा, "मामला क्या है?" उसने कहा, "सब कुछ समाप्त हो गया है, और मैं आत्महत्या करने पर विचार कर रहा हूँ।"


दोस्त ने कहा, "लेकिन तुम इतने लंबे समय से विचार कर रहे हो। मुझे बताओ कि मामला क्या है – शायद मैं तुम्हारी मदद कर सकता हूँ।" नसरुद्दीन ने कहा, "मैंने उस स्त्री से मुझसे शादी करने के लिए कहा।"


दोस्त ने कहा, "हाँ, कुछ और कहने की आवश्यकता नहीं है, मैं समझ गया। उसने ना कहा होगा। लेकिन तुम मूर्ख हो। जब कोई स्त्री ना कहती है तो उस पर विश्वास मत करो; उसका हमेशा मतलब हाँ होता है।"


नसरुद्दीन ने कहा, "मैं वह ज्ञान जानता हूँ, और यदि उसने ना कहा होता, तो कोई समस्या नहीं होती। लेकिन जब मैंने प्रस्ताव रखा तो उसने कहा, 'चूहे (Rats)।' तो अब क्या समझूँ? उसने 'चूहे' कहा; उसने कभी ना नहीं कहा। यदि उसने ना कहा होता, तो हाँ समझा जा सकता था।"


हर किसी का मन बिल्कुल उस स्त्री की तरह है। जब तुम ना कहते हो, तो हाँ उसके पीछे छिपी होती है। यदि किसी की थोड़ी भेदक दृष्टि है, तो वह तुम्हारी हाँ को तुम्हारे ना के पीछे छिपा देख सकता है। जब तुम हाँ कहते हो तो वह चमड़ी के नीचे ही होती है, ना उसके पीछे छिपा होता है। और तुम्हारी हाँ को बिना किसी प्रयास के ना में बदला जा सकता है। तुम्हारे ना को बिना अधिक प्रयास के हाँ में बदला जा सकता है। तुम्हारी हाँ और ना केवल डिग्री में भिन्न हैं, गुण में नहीं। वे बदले जा सकते हैं, वे लगातार बदलते रहते हैं।


यहाँ तक कि एक छोटा बच्चा भी यह जानता है। पिता कहता है, "नहीं, तुम आज फिल्म देखने नहीं जा रहे हो।" लेकिन एक छोटा बच्चा भी जानता है कि हाँ उसके पीछे छिपी है। वह हंगामा करना शुरू कर देता है, वह रोना शुरू कर देता है, और कुछ ही मिनटों में पिता कहता है, "जा, जा! यहाँ से चला जा।" बच्चा जानता है कि हाँ ना के पीछे छिपी है। उसे तुरंत बाहर लाया जा सकता है, थोड़े से प्रयास की आवश्यकता है। और कोई भी बच्चा तुम्हारी हाँ या ना पर विश्वास नहीं करता क्योंकि तुम इतनी आसानी से बदल सकते हो; कोई बच्चा तुम पर भरोसा नहीं करता। लेकिन मानव मन ऐसा ही है।


तो पहली बात: तुम दुख में नहीं हो। बुद्ध ने ऐसा कहा है, मैं ऐसा कह रहा हूँ, लेकिन तुम जानते हो कि तुम दुख में नहीं हो। तुम महसूस करते रहते हो, आशा करते रहते हो, कि कल कुछ होने वाला है। और कल नशा है; कल के माध्यम से तुम अपने आप को नशे में डालते हो, और फिर जो दिन है, आज, तुम उसे सह सकते हो। यह बहुत नहीं है, केवल कुछ घंटों का सवाल है और फिर कल वहाँ होगा; वह निकट और निकट आ रहा है। इस धरती पर दुख के कारण, हम स्वर्ग की कल्पना किसी दूसरे जीवन में कहीं करते हैं; वह स्वर्ग हमारे कल का विस्तार है। बस जो दुख हमारे चारों ओर है, उसे किसी भी तरह से ढोने के लिए, हम कहीं आगे देखते हैं। हम कभी अभी, यहाँ नहीं देखते।


तुम दुख में नहीं हो। मैं ऐसा कह सकता हूँ; तुम विश्वास करते रहते हो कि सुख बस निकट है, तुम बस उसके कगार पर हो। लक्ष्य इतना निकट है, तो क्यों छोड़ें? बस थोड़ा और जारी रखो, धैर्य रखो। यदि तुम्हें एहसास हो जाता है कि तुम दुख में हो, तो यह पूछने की कोई आवश्यकता नहीं है कि इसे कैसे गिराया जाए। तब गुरुओं की जरूरत होगी तुम्हें यह सिखाने के लिए कि इससे कैसे चिपके रहना है, और तब भी तुम उनकी बात नहीं सुनोगे।


एक बार जब तुम जान जाते हो कि तुम्हारा जीवन दुख है, तो एक बुद्ध भी तुम्हें इससे चिपके रहने के लिए नहीं मना सकता। लेकिन प्रवेश वहाँ नहीं है। यह तुम्हारा अपना एहसास नहीं है। यह जानना तुम्हारा ज्ञान नहीं है, यह ज्ञान तुम्हारे अपने प्रयासों द्वारा प्राप्त नहीं किया गया है। यह उधार है, यह सस्ता है। तुमने सुना है कि जीवन दुख है, लेकिन तुमने इसे जाना नहीं है। और तुम कहते हो, "हम इस सपनों के जीवन से क्यों चिपके रहते हैं?" यह तुम्हारे लिए सपनों का जीवन नहीं है; यह वास्तविक है। जब तुम एक सपना देखते हो, तो सपना वास्तविक होता है। जो कोई नींद से जाग गया है, वह कहता रह सकता है कि तुम जो कुछ भी देख रहे हो, वह सिर्फ एक सपना है, लेकिन जो व्यक्ति सपना देख रहा है, वह एक वास्तविकता देख रहा है, सपना नहीं। सपने में, चाहे कितना भी बेतुका, तुम इसे सपने की तरह महसूस नहीं कर सकते। तुम उस पर विश्वास करते हो, क्योंकि एक बार जब तुम महसूस करते हो कि यह एक सपना है, तो सपना गायब हो जाता है। सपना वहाँ नहीं रह सकता, तुम्हारा सहयोग वापस ले लिया जाता है। तुम केवल वास्तविकता के साथ सहयोग कर सकते हो, सपनों के साथ नहीं; और यदि तुम सहयोग करते हो, तो सपने वास्तविकता बन जाते हैं – यह तुम्हारे सहयोग के माध्यम से होता है।


रात में, गहरी नींद में, तुम सपना देखते हो कि तुम राजा बन गए हो। तुम एक भिखारी हो सकते हो, या विपरीत: तुम एक राजा हो और तुम सपना देखते हो कि तुम भिखारी बन गए हो। लेकिन उस सपने में तुम इतने तादात्म्य हो जाते हो कि तुम नहीं सोच सकते कि यह एक सपना हो सकता है। यदि तुम सोच सकते हो कि यह एक सपना हो सकता है, तो सपना तुरंत बंद हो जाएगा। वह टूट जाएगा, तुम उससे बाहर आ जाओगे।


इसे आजमाओ। साधारण सपनों के साथ इसे आजमाओ। रात को सोने जाते समय, हर दिन बस एक ही विचार सोचते रहो: "जब मैं सपना देखूँ, तो मुझे याद रखना चाहिए कि यह एक सपना है।" इस विचार को अचेतन में उतरने में कई महीने लगेंगे, लेकिन यह वहाँ पहुँच जाएगा। तीन सप्ताह से तीन महीने के बाद यह पहुँच जाएगा यदि तुम दृढ़ रहते हो, यदि तुम भूलते नहीं हो। हर रात नींद में गिरते समय, तुम सोचते रहो कि जब कोई सपना शुरू होगा तो तुम तुरंत पहचान लोगे कि यह एक सपना है। तीन सप्ताह से तीन महीने के बाद ऐसा होगा; अचानक एक दिन तुम सपना देखना शुरू करोगे और तुम्हें एहसास होगा, "यह एक सपना है।" तुरंत सपना गायब हो जाएगा और तुम्हारी आँखें खुल जाएंगी।


यदि तुम सपने में पहचान लेते हो कि यह एक सपना है, तो सपना टूट जाता है, सपना अस्तित्व में नहीं रह सकता। यह तुम्हारे सहयोग के माध्यम से अस्तित्व में रहता है, तुम्हारी पहचान की आवश्यकता होती है। यदि तुम उसके प्रति प्रतिबद्ध हो, यदि तुम उसमें शामिल हो जाते हो, तभी वह जारी रह सकता है। और यही बड़े सपने के साथ होता है जो जीवन है। जब तुम्हें एहसास होता है कि यह एक सपना है, तो तुरंत तुम एक बुद्ध बन गए, तुम प्रबुद्ध हो गए। लेकिन यह प्रबुद्धता तुम्हें दूसरों के जानने, दूसरों के ज्ञान से नहीं हो सकती।


बुद्ध तुम्हें यह बताते रह सकते हैं कि यह एक सपना है जो तुम जी रहे हो, लेकिन तुम केवल यह महसूस करोगे कि यह आदमी एक गड़बड़ी है, एक लगातार उपद्रव है, वह तुम्हारे जीवन में गड़बड़ी डाल रहा है। इसीलिए हम ऐसे व्यक्तियों को मार देते हैं। सुकरात – हमने उसे जहर दे दिया क्योंकि वह एक बड़ा गड़बड़ पैदा करने वाला था। यीशु – हमने उसे सूली पर चढ़ा दिया क्योंकि वह एक उपद्रव था। हर कोई इतने सुंदर सपने देख रहा है, और ये व्यक्ति बिना बुलाए, अनावश्यक रूप से लोगों को परेशान करते रहते हैं और उनसे कहते हैं, "जागो! तुम सपना देख रहे हो। यह एक सपना है।" और हो सकता है कि व्यक्ति इतना सुंदर सपना देख रहा हो कि वह उस सपने के लिए अपना पूरा जीवन दाँव पर लगा सकता है।


अब मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि सामान्य मन के लिए, सपना देखना एक अनिवार्यता है। यदि तुम सपने नहीं देख सकते, यदि तुम्हें सपने देखने की अनुमति नहीं है, तो तुम पागल हो जाओगे। पहले यह सोचा जाता था कि नींद एक आवश्यकता है, अब नया शोध एक पूरी तरह से अलग बात कहता है। नया शोध कहता है कि नींद एक अनिवार्यता नहीं है; यह नींद नहीं है जो तुम्हें आराम देती है, यह सपने देखना है जो तुम्हें आराम देता है। और यदि तुम्हें सपने देखने की अनुमति है, तो तुम सुखी रहोगे, यदि तुम्हें सपने देखने की अनुमति नहीं है, तो तुम पागल हो जाओगे।


पूरी रात एक लय होती है: नींद की अवधि, फिर सपने की अवधि, फिर नींद की अवधि, फिर सपने की अवधि, लगभग समान अवधि की। यदि तुम आठ घंटे सोते हो, तो कम से कम चार घंटे तुम सपने देख रहे होते हो: चालीस मिनट सपना, फिर चालीस मिनट नींद, फिर चालीस मिनट सपना, फिर चालीस मिनट नींद – दिन और रात की तरह, एक लय।


उन्होंने कई प्रयोग किए हैं, क्योंकि अब यह बाहर से पता लगाया जा सकता है कि तुम सपना देख रहे हो या नहीं। बहुत सारे उपकरणों की आवश्यकता नहीं है। जब कोई व्यक्ति सो रहा होता है, तो तुम बस उसकी आँखों को देखते रह सकते हो। जब वह सपना देखता है, तो आँखें तेजी से चलती हैं। वह सपना देख रहा होता है, इसलिए आँखें तेजी से चलती हैं। जब वह गहरी नींद में होता है, तो आँखें रुक जाती हैं और मृत हो जाती हैं। तो बस एक व्यक्ति के पास बैठकर जो सो रहा हो, तुम नोट कर सकते हो कि वह कब सपना देख रहा है और कब सो रहा है।


उन्होंने व्यक्तियों को परेशान करने की कोशिश की है जब वे सो रहे होते हैं, उनकी चालीस मिनट की नींद की अवधि में। जब वे सपना देख रहे होते हैं, तो वे उन्हें परेशान नहीं करते; जब वे सोने लगते हैं, तो वे उन्हें परेशान करते हैं। कई रातों तक तुम एक व्यक्ति को परेशान कर सकते हो जब वह सो रहा हो, लेकिन सपने की अवधि को अनुमति देते हो, और वह खुश और ठीक रहेगा, कोई समस्या नहीं; वह सुबह थका हुआ महसूस नहीं करेगा। लेकिन दूसरा करो: जब वह सो रहा हो, उसे सोने दो; जब वह सपना देखना शुरू करे, उसे जगाओ। यदि लगातार पूरी रात, केवल तीन रातों के लिए, तुम किसी व्यक्ति को सपना देखने की अनुमति नहीं देते, तो वह पागल हो जाएगा। क्यों? इसकी इतनी अधिक आवश्यकता है। तुम्हारा सामान्य मन सपनों पर पलता है, और यदि किसी व्यक्ति को तीन दिनों तक सपना देखने की अनुमति नहीं दी जाती है, तो वह जागते हुए सपने देखना शुरू कर देगा। यह इतनी बड़ी आवश्यकता है। वह जाग रहा होगा, अपनी कुर्सी पर बैठा होगा, और सपना देख रहा होगा। उसे अपना कोटा पूरा करना होगा, दिन में उसे सपने देखने होंगे।


और यदि तुम कई हफ्तों तक जोर देते हो, यदि किसी व्यक्ति को कम से कम तीन हफ्तों तक सपना देखने की अनुमति नहीं दी जाती है, तो वह भ्रमात्मक हो जाएगा। वह जाग रहा होगा और एक ऐसे व्यक्ति से बात कर रहा होगा जो उपस्थित नहीं है। वह बिल्कुल पागलों की तरह हो जाएगा। अब मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि ये पागल जिन्हें हमने पागलखानों में धकेल दिया है, वे केवल ऐसे व्यक्ति हो सकते हैं जिन्हें सपने के भोजन के मामले में भूखा रखा गया है। उन्हें सामान्य जीवन में पुनः समायोजित होने के लिए अधिक सपनों की आवश्यकता होती है। समस्या क्या है? सपनों की इतनी अधिक आवश्यकता क्यों है? तुम सपनों के बिना क्यों नहीं रह सकते? क्योंकि तुम्हारा जीवन इतना दुखमय है कि केवल सपनों के माध्यम से ही तुम अस्तित्व में रह सकते हो। यदि तुम जीवन को उसकी नग्नता में, बिना किसी सपने के, जैसा है वैसा जान लेते हो, तो तुम आत्महत्या कर लोगे।


अल्बर्ट कैमस ने लिखा है कि एकमात्र दार्शनिक समस्या यह है कि आत्महत्या की जाए या नहीं, और यही बड़ी समस्या है। यदि तुम्हें एहसास हो जाता है कि पूरा जीवन बेकार है... तुम क्या कर रहे हो? क्या हो रहा है? कुछ नहीं हो रहा, और तुम दुख में बने रहते हो। यदि तुम तर्कसंगत हो, तो तुम आत्महत्या करने के बारे में सोचने लगोगे।


सपने तुम्हें आत्महत्या न करने में मदद करते हैं। वे तुम्हें अपनी दुनिया बनाने में मदद करते हैं जिसमें तुम खुश हो सकते हो, जिसमें तुम आनंद ले सकते हो, जिसमें तुम सम्राट बन सकते हो, जिसमें तुम विजेता बन सकते हो, जिसमें तुम उड़ सकते हो और ग्रहों तक पहुँच सकते हो, जिसमें तुम कुछ भी कर सकते हो। तुम केवल अपने सपनों में स्वतंत्र हो। पूरा जीवन एक गुलामी है, केवल अपने सपनों में ही तुम पूरी दुनिया को नष्ट कर सकते हो और एक नई दुनिया बना सकते हो।


तुम अपने सपनों में एक सुंदर स्त्री पा सकते हो, एक सुंदर पुरुष। जीवन इतना सुंदर नहीं है। और स्त्री चाहे कितनी भी सुंदर हो, तुम पास आते हो और फूल गायब हो जाते हैं और केवल काँटे रह जाते हैं। पुरुष चाहे कितना भी सुंदर हो, एक व्यक्ति, यदि तुम दूर हो तो सुंदरता है, लेकिन जितना पास आते हो, सुंदरता उतनी ही वाष्पित होने लगती है। सार्त्र कहते हैं, "नरक दूसरे लोग हैं – दूसरा ही नरक है।" तुम जितना दूसरे के पास आते हो, उतना ही अधिक नरक बनता है। केवल अपने सपनों में ही तुम स्वर्ग में हो सकते हो।


इसलिए यह मत कहो कि तुम जानते हो कि तुम्हारा जीवन दुख और सपने जैसा है – यह तुम्हारे लिए वास्तविक है। मैं तुमसे कहता हूँ कि यह वास्तविक है; एक बुद्ध के लिए यह अवास्तविक है। लेकिन तुम अभी तक बुद्ध नहीं हो, इसलिए अपनी वास्तविकता के साथ रहो, और अपने वास्तविक मन के साथ रहो। उधार की चीजों के साथ मत चलो, क्योंकि एक बार जब तुम उधार की चीजों के साथ चलते हो, तो तुम फिर कभी वास्तविकता पर नहीं आ सकते।


"यदि ईश्वर यहीं और अभी है, तो हमें उसे देखने से क्या रोकता है? हम अपने सपनों के जीवन से क्यों चिपके रहते हैं, भले ही वह हमारे लिए दुख बन गया है?" फिर से सोचो। इस पर चिंतन करो। यदि यह तुम्हारे लिए दुख है – तुम्हारे लिए मैं बार-बार जोर देता हूँ, मेरे लिए नहीं – यदि यह तुम्हारे लिए दुख है, तो कुछ मत करो। इस तथ्य के साथ रहो कि तुम्हारा जीवन तुम्हारे लिए दुख बन गया है, क्योंकि यदि तुम इसके बारे में कुछ करना शुरू करते हो, तो तुम फिर से कल में आशा पैदा कर सकते हो। बस तथ्य के साथ रहो। यदि यह नरक है, तो नरक में रहो, कुछ मत करो। बस सतर्क रहो कि यह नरक है। और यदि तुम धैर्यवान और सतर्क हो सकते हो और प्रतीक्षा कर सकते हो, तो केवल प्रतीक्षा के माध्यम से ही नरक गायब हो जाएगा, वह गिर जाएगा। उसे तुम्हारे सहयोग की आवश्यकता है। यह सपनों की तरह ही है।


इसीलिए शंकर और बुद्ध कहते हैं कि तुम्हारा जीवन एक सपने जैसा जीवन है – क्योंकि इसे सपनों की तरह ही गिराया जा सकता है। यदि तुम सतर्क हो जाते हो, तो एक सपना गायब हो जाता है; यदि तुम अपने दुख के प्रति सतर्क हो जाते हो, तो दुख गायब हो जाता है। तुम उससे चिपके रहते हो क्योंकि तुम सोचते हो कि यह दुख नहीं है, या इसके भीतर कहीं कोई सुख छिपा है। यह बाहरी रूप से दुख हो सकता है, लेकिन इसके पीछे एक गहरा खजाना छिपा है, इसलिए तुम्हें उस खजाने के लिए इससे चिपके रहना होगा। तुम्हारा जीवन दुख है – लेकिन तुम्हारे लिए नहीं। इसके दुख को पहचानो, यह गिर जाता है। वही सत्य तुम्हें रूपांतरित करता है। और जिस क्षण दुख गिरता है, ईश्वर प्रकट हो जाता है। एक दुखी मन के लिए ईश्वर प्रकट नहीं हो सकता। एक उत्सव मन के लिए ईश्वर प्रकट होता है।


याद रखो, केवल एक उत्सव मन के लिए, एक मन के लिए जो खुश है, आनंदित है, क्षण-प्रतिक्षण आनंद ले रहा है, उत्साहपूर्ण है, ईश्वर प्रकट होता है। एक दुखी मन के लिए ईश्वर प्रकट नहीं हो सकता, क्योंकि एक दुखी मन बंद होता है। ईश्वर यहीं और अभी है, लेकिन तुम यहाँ और अभी नहीं हो। यदि तुम भी यहाँ और अभी हो, तो ईश्वर तुम्हें प्रकट होगा। मेरा पूरा प्रयास तुम्हें यहाँ और अभी लाने का है। इसी क्षण, यदि तुम यहाँ हो सकते हो, तो कुछ भी छिपा नहीं है।


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प्रश्न 4: यदि ऋषि स्थायी रूप से दिव्य चेतना में हैं, तो असत्य कैसे आ सकता है?


प्रश्न: "बिलव्ड ओशो, उपनिषद के ऋषि को डर है कि वह कुछ असत्य बोल देगा, और इसलिए वह प्रार्थना करता है, 'मेरी वाणी मेरे मन में स्थापित हो।' क्या इसका मतलब यह है कि जब वह बोलने के लिए पृथ्वी पर उतरता है, तो वह अपनी प्रबुद्ध चेतना से बाहर आकर ऐसा करता है, वापस सामान्य मन में? यदि वह स्थायी रूप से दिव्य चेतना में है, तो असत्य कैसे आ सकता है?"


मन की सामान्य अवस्था में वापस आने का कोई तरीका नहीं है। एक बार प्रबुद्ध होने के बाद, फिर से अंधा होने का कोई तरीका नहीं है, अंधकार में गिरने का कोई तरीका नहीं है – क्योंकि यह प्रकाश कोई आकस्मिक चीज नहीं है। जब तुम प्रबुद्ध हो जाते हो, तो तुम स्वयं प्रकाश बन जाते हो, इसलिए तुम जहाँ भी जाओ, यहाँ तक कि अंधकार में भी, वहाँ प्रकाश होगा। यह कुछ बाहरी नहीं है, प्रकाश कोई आकस्मिक चीज नहीं है। प्रबुद्धता का मतलब है कि तुम प्रकाश बन गए हो, इसलिए अब फिर से अंधकार में गिरने का कोई तरीका नहीं है। तुम जहाँ भी जाओ, भले ही पहले अंधकार था, तुम्हारे वहाँ पहुँचने मात्र से अंधकार गायब हो जाएगा। इसलिए वापस गिरने का कोई तरीका नहीं है।


फिर यह ऋषि क्यों डरता है? वह क्यों डरता है? वह एक गहरे कारण से डरता है। डर यह नहीं है कि वह असत्य बोल सकता है, डर यह है कि जिस क्षण सत्य को भाषा में व्यक्त किया जाता है, वह विकृत हो जाता है। वह कोई असत्य बोलने वाला नहीं है, लेकिन भाषा का माध्यम ऐसा है कि तुम उसके माध्यम से जो कुछ भी व्यक्त करते हो, वह बदल जाता है, उसकी प्रकृति बदल जाती है। यह बिल्कुल ऐसे ही है: एक नदी बह रही है और तुम एक सीधी छड़ी को पानी में नीचे धकेलते हो। जैसे ही वह पानी में प्रवेश करती है, वह सीधी नहीं रहती, पानी का माध्यम और प्रकाश किरणों का अपवर्तन उसे बदल देता है – सीधी छड़ी सीधी नहीं रहती। उसे फिर से बाहर निकालो, वह सीधी है; उसे फिर से नीचे धकेलो, वह सीधी नहीं रहती। छड़ी सीधी रहती है, लेकिन पानी के माध्यम के कारण ऐसा प्रतीत होता है मानो वह सीधी नहीं है।


सत्य को एक मौन मन में जाना जाता है जहाँ कोई भाषा नहीं है, कोई शब्द नहीं है, कोई मौखिक अस्तित्व नहीं है... पूर्ण मौन, ध्वनिहीनता। उस मौन में सत्य का साक्षात्कार होता है, और फिर उसे भाषा के माध्यम से व्यक्त करना होता है। जो भाषा से परे जाना गया है, जो भाषा को पार करता है, उसे संचार करने के लिए फिर से भाषा में धकेलना होता है। और तुम्हारे साथ इसे संचार करने का कोई अन्य तरीका नहीं है। तुम मौन को नहीं समझ सकते।


मैं यहाँ चुप रह सकता हूँ; तुम इसे नहीं समझ सकते। यदि तुम मौन को समझ सकते हो, तो व्यक्त करने की कोई आवश्यकता नहीं है, लेकिन फिर तुम यहाँ नहीं होते, फिर यहाँ आने की भी कोई आवश्यकता नहीं होती। यदि तुम मेरे मौन को समझ सकते हो, तो तुम आकाश के मौन को भी समझ सकते हो, क्योंकि भाषा वही है। तुम चट्टानों के मौन को समझ सकते हो, तुम रात के मौन को समझ सकते हो। तुम उस मौन को समझ सकते हो जिससे ब्रह्मांड हर जगह भरा है। मेरे पास आने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि मौन हर जगह है – यदि तुम इसे समझते हो।


तुम इसे नहीं समझते। इसलिए तुम एक चट्टान के पास नहीं जाते, तुम एक पेड़ के पास नहीं जाते, तुम मेरे पास आए हो... क्योंकि पेड़ इसे भाषा में व्यक्त नहीं कर सकता, चट्टान इसे भाषा में व्यक्त नहीं कर सकता। चट्टान भी उतनी ही दिव्य में विद्यमान है जितना मैं, लेकिन चट्टान इसे भाषा के माध्यम से व्यक्त नहीं कर सकता। तुम्हें भाषा चाहिए। डर तुम्हारे कारण है, डर भाषा के माध्यम के कारण है। सत्य कहा गया तो असत्य हो जाता है।


लाओ त्ज़ु ने कहा है, "जो ताओ कहा जा सकता है, वह ताओ नहीं रहता। जो सत्य कहा जा सकता है, वह सत्य नहीं रहता।" क्यों? – क्योंकि भाषा, भाषा का तंत्र, द्वंद्व पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए, यदि तुम मुझसे पूछते हो कि क्या ईश्वर प्रकाश है या अंधकार, यदि मैं प्रकाश कहता हूँ, तो यह गलत है, क्योंकि वह अंधकार भी है। यदि मैं अंधकार कहता हूँ, तो यह गलत है, क्योंकि वह प्रकाश भी है। यदि मैं कहता हूँ कि वह प्रकाश है, तो सवाल उठता है, "तो अंधकार अस्तित्व में है। वह कहाँ मौजूद है? तो ईश्वर के अलावा कुछ और होना चाहिए जहाँ अंधकार मौजूद है।" यदि मैं कहता हूँ कि ईश्वर जीवन है... तो मृत्यु? मृत्यु कौन है? यदि मैं कहता हूँ कि ईश्वर मृत्यु है, तो जीवन कौन है? और यदि मैं कहता हूँ कि ईश्वर जीवन और मृत्यु दोनों है, तो यह एक विरोधाभास बन जाता है। यदि मैं कहता हूँ कि ईश्वर प्रकाश और अंधकार दोनों है, तो तुम कहोगे, "तुम कुछ खास नहीं कह रहे हो, यह एक विरोधाभास है। एक दोनों कैसे हो सकता है?"


ये चार तरीके हैं: या तो मैं कह सकता हूँ कि ईश्वर प्रकाश है या अंधकार है, या मैं कह सकता हूँ कि ईश्वर दोनों है, या मैं कह सकता हूँ कि ईश्वर नहीं है, लेकिन समस्या बनी रहती है। और ये एकमात्र तरीके हैं व्यक्त करने के। इसीलिए महावीर ने सप्तभंगी – सात गुना तर्क – विकसित किया है। तुम एक प्रश्न पूछते हो और महावीर सात उत्तर देंगे। और यदि तुम उनके सात उत्तरों को सुनने के लिए उनके साथ रह सकते हो, तो तुम उससे अधिक भ्रमित हो जाओगे जितने तुम उनके पास आए थे।


यदि तुम ईश्वर के बारे में पूछते हो, तो वह कहेगा ईश्वर है; तुरंत वह कहेगा ईश्वर नहीं है; तुरंत वह कहेगा ईश्वर दोनों है, है और नहीं है; तुरंत वह कहेगा ईश्वर दोनों नहीं है, है और नहीं है – और वह चलता रहता है। उसका उत्तर सात गुना होगा, क्योंकि वह कहता है, "मैं असत्य नहीं बोल सकता। यह संपूर्ण सत्य है।" लेकिन तुम वैसे ही रहते हो जैसे थे और उससे भी अधिक भ्रमित। तुम्हें एक स्पष्ट उत्तर चाहिए, तुम चाहते हो कि वह या तो कहे कि ईश्वर है, या कहे कि ईश्वर नहीं है।


इसीलिए बुद्ध चुप रहे। तुम ईश्वर के बारे में पूछते, वह चुप रहता। वह कहता कि वह ग्यारह प्रश्नों का उत्तर नहीं देगा, और वे ग्यारह प्रश्न संपूर्ण दर्शन का आधार हैं; संपूर्ण तत्वमीमांसा उन ग्यारह प्रश्नों से बनी है। वह उत्तर नहीं देता था क्योंकि वह कहता था, "मैं जो कुछ भी कहूंगा वह गलत होगा, या मुझे इसे इस तरह से कहना होगा कि कुछ भी स्पष्ट नहीं होगा – जैसा महावीर कर रहे हैं।"


यह ऋषि इस उपनिषद में ठीक-ठीक, सार्थक रूप से, विरोधाभास पैदा किए बिना, भाषाई रूप से समझने योग्य कथनों को संप्रेषित करने का प्रयास करने जा रहा है। इसलिए वह डरता है – क्योंकि भाषा की प्रकृति विकृत कर देती है।


दूसरी बात, जब कुछ कहा जाता है और तुमने उसे सुन लिया है, तो तुम उसे नष्ट कर दोगे। पहले यह भाषा के माध्यम से नष्ट होगा; दूसरे, यह तुम्हारे मन में प्रवेश कर गया है, और तुम्हारा मन एक पागलखाना है। एक बार यह तुम्हारे मन में प्रवेश कर जाता है, तो इससे क्या अर्थ निकलेगा, कोई नहीं कह सकता। तुम इसकी व्याख्या कैसे करोगे, तुम इसका अनुसरण कैसे करोगे, तुम अपनी व्याख्या के अनुसार क्या करोगे, कोई नहीं जानता।


बुद्ध ने कहीं कहा है कि अज्ञानी लोगों से बात करना खतरनाक है, क्योंकि तुम जो कुछ भी कहते हो, वे सोचते हैं कि उन्होंने समझ लिया है, और फिर वे स्वयं गुरु बन जाते हैं। तुम अपने सत्य के अधिकारी नहीं रह जाते; वे भी उसके अधिकारी हो जाते हैं, और वे उसकी व्याख्या करेंगे। इसीलिए इतने सारे दर्शन अस्तित्व में हैं।


बुद्ध मर गए। कम से कम चौबीस प्रणालियाँ तुरंत वहाँ थीं, चौबीस नेता कह रहे थे, "बुद्ध का यही अर्थ है" – और वे सभी एक-दूसरे का खंडन कर रहे थे। चौबीस सम्प्रदाय, और प्रत्येक सम्प्रदाय दूसरे तेईस के खिलाफ: "वे अन्य तेईस बिल्कुल गलत हैं!" यह तब भी होता है जब गुरु जीवित होता है, जब गुरु मर जाता है तो क्या होता है, इसके बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता।


मुझे याद है, एक बार ऐसा हुआ: फ्रायड बूढ़ा था, और उसकी मृत्यु से ठीक पहले, दो या तीन साल पहले... और फ्रायड बिल्कुल भी धार्मिक व्यक्ति नहीं था, विश्वास और श्रद्धा का व्यक्ति नहीं था, बल्कि संदेह, तर्क और बुद्धि का व्यक्ति था। लेकिन फिर भी वह एक बहुत खतरनाक क्षेत्र में काम कर रहा था – मन – इसलिए वह अपने अधिकार में एक गुरु बन गया था। उसके शिष्य थे, एक बड़ा अनुयायी समूह था, एक बड़ा आंदोलन था, इसलिए यह सोचकर कि वह जल्द ही मरने वाला था क्योंकि वह बीमार और बूढ़ा था, उसके सभी महान शिष्य इकट्ठा हुए, बस उससे अंतिम बार मिलने के लिए।


बीस लोग वहाँ थे, फ्रायड उनके साथ बैठा था और वे चर्चा कर रहे थे। वे चर्चा कर रहे थे, और वे भूल गए कि फ्रायड अभी भी जीवित था। वे चर्चा कर रहे थे कि कुछ सिद्धांतों के बारे में फ्रायड का क्या अर्थ था और प्रत्येक की अपनी व्याख्या थी। उन्होंने चर्चा की, बहस की, और अराजकता थी, और उनके एक निष्कर्ष पर पहुँचने की कोई संभावना नहीं थी – और फ्रायड वहाँ बैठा था! वह अचानक खड़ा हुआ और कहा, "मेरे दोस्तों, तुम पूरी तरह से भूल गए हो – मैं अभी भी जीवित हूँ! तुम मुझसे पूछ सकते हो कि मेरा क्या अर्थ है।"


लेकिन यदि मैं वहाँ होता, तो मैं फ्रायड से कहता, "यह भी मदद नहीं करेगा, क्योंकि वे पूछ सकते हैं कि तुम्हारा क्या अर्थ है, लेकिन फिर वे अर्थ की व्याख्या करेंगे। फिर फिर से बीस व्याख्याएँ होंगी। 'तुम्हारे अर्थ का क्या अर्थ है?'" तुम शिष्यों से बच नहीं सकते। यही डर है।


आज के लिए इतना पर्याप्त है।

ओशो की वाणी

Come Follow to You Vol 1 10

 नीचे दिए गए सात प्रश्नों और ओशो के उत्तरों का हिंदी अनुवाद प्रस्तुत है। यह प्रश्नोत्तर सत्र 'कम फॉलो टू यू वॉल्यूम 1' के अंतिम भाग ...